गोरखपुर। बिगड़े मानसून से एक तरफ जहां खरीफ फसलों क्षति हुई वहीं दो दिन पहले आए चक्रवाती तूफान से आलू की फसलों का जबरदस्त नुकसान हो गया। पैदावार कम होने से आलू की मांग और सप्लाई में अंतर बढ़ गया और इसी कारण बाजार में आलू की कीमत असमान छू रही है। कीमतों में तेजी के कारण गरीब और मध्यवर्गीय परिवारों का बजट बिगड़ गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्थित से निपटने के लिए आलू आयात करने का फैसला लिया है। इस फैसले से किसको कितना फायदा होगा, इस विषय पर कुछ अर्थशास्त्रित्त्यों से हुई बातचीत के कुछ अंश
आयात और जमाखोरों पर सख्ती ही विकल्प
आलू की फसल खराब हो गई है, अवसर का लाभ उठा कर जमाखोरों ने आलू का भंडारण शुरू कर दिया है, जिसके कारण बाजार में आलू की कीमत बढ़ी है। आलू आम आदमी की सब्जी है, इस कारण बढ़ी हुई कीमत से आम आदमी ही सबसे ज्यादा प्रभावित है। इनको राहत पहुंचाने के लिये सरकार ने आलू के आयात का फैसला लिया है। आलू का आयात होगा तो जमाखोरी रुक जाएगी और बाजार में आलू की बढ़ती कीमत भी ठहर जायेगी। मौजूदा आर्थिक नीत के कारण आलू चिप्स बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर अंकुश लगाना संभव नहीं है।
प्रो. एस एम यादव अर्थशास्त्रत्त् विभाग गोरखपुर विश्वविद्यालय
मेक इन इंडिया से किसानों का अहित
विदेशी पूंजी आधारित देश की अर्थव्यवस्था में किसानों का हित गौड़ हो गया है। आलू की कीमतें बढ़ने से किसानों को जो लाभ प्राप्त होना चाहिये था वह अब आलू के आयात के कारण प्राप्त नहीं होगा। हालांकि आम आदमी को इस फैसले से राहत जरूर मिलेगी। वर्तमान सरकार का नारा मेक इन इंडिया है इसलिए आलू चिप्स बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता है। थोड़े दिनों की बात है आलू की नई फसल बाजार में आने पर कीमत खुद भी ठहर जायेगी। इसके बाद होने वाला आयात भी बंद हो जायेगा।
प्रो. करुणाकरण राम त्रिपाठी अर्थशास्त्रत्त् विभाग गोरखपुर विश्वविद्यालय