गोरखपुर। तेलंगाना राज्य का गठन पूरी तरह से राजनीतिक सोच पर आधारित है। कांग्रेस और संप्रग को लग रहा था कि अगर चुनाव से पहले पृथक तेलंगाना राज्य का गठन न हुआ तो अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में आंध्र प्रदेश से उसकी वोटों की झोली खाली रह जाएगी और बड़ा नुकसान होगा। पृथक राज्य के गठन के बाद कम से कम तेलंगाना में यूपीए और कांग्रेस को लाभ मिल सकता है। इसी सोच के साथ यूपीए सरकार ने पृथक तेलंगाना राज्य के गठन को मंजूरी दी है, लेकिन यह भी सच है कि पृथक तेलंगाना राज्य के लिए पिछले दो दशक से गंभीर राजनीतिक आंदोलन भी हुए हैं जिसके आगे केंद्र सरकार को झुकना पड़ा।
जहां तक पूर्वांचल राज्य का मसला है तो इसके लिए कभी भी गंभीर राजनीतिक प्रयास नहीं हुए। एक 1962 के उस वाकये को छोड़ दें, जिसमें विश्वनाथ सिंह गहमरी ने लोकसभा में पूर्वांचल के पिछड़ेपन का उल्लेख करते हुए पृथक पूर्वांचल राज्य की मांग की थी। उस पर तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने पटेल कमीशन गठित किया था, पूर्वांचल की वास्तविक स्थिति का जायजा लेने के लिए। लेकिन उसके बाद से किसी सांसद ने पूर्वांचल राज्य के गठन की मांग संसद में नहीं उठाई। छोटे दलों द्वारा जरूर स्थानीय स्तर पर आंदोलन किए जाते रहे पर वे उतने मजबूत नहीं हो सके कि केंद्र सरकार को पृथक पूर्वांचल राज्य के गठन के लिए सोचने पर मजबूर कर दें। इसी का नतीजा रहा कि विधानसभा के अंतिम सत्र में तत्कालीन मुख्य मंत्री मायावती ने 15 मिनट की विधानमंडल की कार्यवाही में पृथक पूर्वांचल, बुंदेलखंड और हरित प्रदेश का प्रस्ताव पारित करा कर केंद्र को भेज दिया। मगर यह गंभीर राजनीतिक आंदोलन न होने का ही नतीजा था कि केंद्र ने उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया।
गोरखपुर विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रो. श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी भी उपर्युक्त बातों से इत्तेफाक रखते हैं। साथ ही वह छोटे राज्यों के गठन के खिलाफ भी नहीं हैं। प्रो. त्रिपाठी का कहना है कि अगर उत्तराखंड या झारखंड की बात करें तो यह वहां की सत्ताधारी पार्टियों की राजनीतिक और विकास संबंधी सोच का अभाव था कि दोनों ही राज्य अपेक्षित रूप से विकास नहीं कर सके, जबकि इन दोनों ही राज्यों के पास प्राकृतिक संसाधनों की कमी नहीं है। झारखंड जहां खनिज संपदा के मामले में संपन्न है तो उत्तराखंड के पास जल संसाधन पर्याप्त मात्रा में हैं। लेकिन स्वार्थपरक राजनीति के चलते प्रदेश के विकास के लिए सही नियोजन नहीं हो सका। राजनीति विज्ञानी प्रो. त्रिपाठी कहते हैं कि अगर छत्तीस गढ़ की बात करें तो वहां विकास तो बहुत हुआ पर दूरस्थ इलाकों तक विकास का लाभ नहीं पहुंच सका जिसके चलते वहां नक्सलवादी गतिविधियां तेज हुईं। लेकिन इससे यह नहीं कहा जा सकता कि छोटे राज्यों की कल्पना गलत है। उन्होंने कहा कि नव गठित राज्यों में जल्दी-जल्दी सत्ता परिवर्तन होते ही हैं, ऐसा जन आकांक्षा की पूर्ति न होने से होता है, लेकिन यह भी सच है कि नवगठित राज्य की कोई भी सरकार पांच साल में जनता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सकती। उन्होंने कहा कि पृथक तेलंगाना राज्य के गठन के बाद चुनाव आते आते देश के कई कोने से पृथक राज्य की आवाज उठने लगेगी और इसमें सबसे संवेदनशील गोरखालैंड है जो केंद्र सरकार के लिए परेशानी का सबब बन सकता है।
प्रो. त्रिपाठी के लिए पृथक राज्य के गठन के लिए पांच चीजें जरूरी हैं, संचार के संसाधन, ऊर्जा की उपलब्धता, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार। इन सभी बिंदुओं के लिहाज से पूर्वांचल राज्य के गठन की बात करें तो यहां मिर्जापुर और सोनभद्र को छोड़ कर खनिज संपदा का भंडार और कहीं नहीं है। जल संसाधन के नाम पर हमारे पास नदियां हैं जिन पर बांध बना कर ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है। इसके अलावा पड़ोसी राज्यों और नेपाल से भी ऊर्जा की उपलब्धता पर वार्ता की सार्थक पहल की जा सकती है। वैसे इस इलाके में पर्यटन उद्योग बढ़ावा दिया जा सकता है। साथ ही मक्का और गन्ने की खेती को बढ़ावा दिया जा सकता है। नए उद्योग लगाने के साथ बंद पड़ी फैक्ट्रियों को चालू किया जा सकता है। ज्यादा से ज्यादा निवेश हो इसके लिए उपाय किए जा सकते हैं। पर इन सबसे पहले पृथक पूर्वांचल राज्य के लिए सांसदों के स्तर पर गंभीर राजनीतिक प्रयास करने होंगे।