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शैतानी चेहरे को उजागर करता है मंटो का साहित्य : प्रोफेसर फातमी

Sun, 25 Nov 2012 12:00 PM IST
Gorakhpur
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गोरखपुर। उर्दू के महान अफसानानिगार सआदत हसन मंटो के साहित्य की आलोचना करने वाले उनकी हकीकत और तरक्की पसंदगी को समझ ही नहीं पाए। उनकी हर रचना शफ्फाक हकीकत को बयां करती है। उनका साहित्य सोच पर नहीं, भोग को जी कर रचा गया है। इसीलिए यह खास और आम दोनों के बीच समान रूप से अंगीकार किया गया। यह कहना है इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के उर्दू विभाग के प्रोफेसर अली अहमद फातमी का। वह शनिवार को गोरखपुर आकाशवाणी की ओर से आयोजित ‘मंटो की हकीकत पसंदगी बनाम तरक्की पसंदगी’ विषयक गोष्ठी को संबोधित कर रहे थे।
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जिला पंचायत सभागार में आयोजित संगोष्ठी के मुख्य वक्ता प्रोफेसर अली अहमद फातमी ने अपने संबोधन में मंटो की रचनाओं ही नहीं उनके समूचे व्यक्तित्व को बखूबी तराशा। कहा उन्होंने मुंशी प्रेमंचद और गोर्की जैसे साहित्यकारों को जीया। उनकी रचना व्यावहारिकता के करीब है। सच का आईना है। जब वह वेश्याओं के जीवन पर लिखते हैं तो उनके भीतर की औरत का अक्स भी निखारते हैं। बस उसे समझने की जरूरत है। उनक ी हर कहानी, निबंध और लघु कथा में शफ्फाक हकीकत का पुट है। ऐसा वही कर सकता है जिसने उस हकीकत को जीया हो। जिस परिवार से वह आते हैं उसमें उन्हें महरूमियत और मायूसी ही मिली। प्रो. फातमी ने मनोविज्ञान के जनक सिगमंड फ्रायड का जिक्र करते हुए कहा कि महरूमियत और मायूसी की इंतहा से गुजरने वाला या तो खुदकुशी कर लेता है या इंतकामी हो जाता है और मंटो ने दोनों ही किया। ‘बाबू गोपीनाथ’, ‘ठंडा गोश्त’, ‘खोल दो’ जैसी रचनाओं के मार्फत उन्होंने इंतकाम लिया तो जीवन के अंतिम समय में विष रूपी शराब का अधिकाधिक सेवन कर जीवन समाप्त कर लिया।
प्रोफेसर फातमी ने कहा कि दरअसल मंटो की कहानी को पढ़ना और उसे समझना आसान नहीं। उन्होंने सेक्स को मीडियम बनाया और बजरिए सेक्स समाज के भीतर क ी कालिख को उजागर किया। उनकी रचनाएं कहीं से भी फूहड़ नहीं लगतीं। उनकी रचनाओं में कसक और दर्द दोनों ही मिलते हैं। उन्होंने प्रेमचंद, गोर्की और चेखव की शैली की तरह मुश्किल बातों को आसान तरीके से पेश किया।
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इससे पूर्व डॉ. मुमताज खान ने ‘टोबा टेक सिंह’, इलाहाबाद आकाशवाणी के डॉ. अशरफ अली बेग ने ‘गुरमुख सिंह की वसीयत’, प्रदीप सुविज्ञ ने ‘खोल दो’, फारुख जमाल ने ‘उलाहना’, ‘खबरदार’, ‘सॉरी’, ‘आराम की जरूरत’, ‘हलाल और झटका’, ‘दावत ए अमल’ का पाठ किया। इन सभी रचनाओं में मंटो ने भारत-पाक बंटवारे का जो दर्द पिरोया है, उसे सुनकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। प्रदीप सुविज्ञ ने जिस अलग अंदाज में ‘खोल दो’ का वाचन किया सभागार में बैठे श्रोताओं की आंखें सजल हो उठीं। गोष्ठी की सदारत गोरखपुर यूनिवर्सिटी के उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. रजीउर्ररहमान ने की। सुनीता ने संचालन किया। कार्यक्रम संयोजक डॉ. अरविंद त्रिपाठी थे।
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