जानलेवा लंग कैंसर का इलाज अब गोलियों से भी संभव है। खास बात ये कि यह पद्धति अब तक प्रचलित कीमोथेरेपी से काफी सस्ती और सटीक है। बुधवार को एम्स से प्रशिक्षित पटना के बुद्धा कैंसर सेंटर के डॉ. अरविंद कुमार ने बीआरडी मेडिकल कॉलेज के आंकोलॉजी डिपार्टमेंट में आयोजित सीएमई को संबोधित करते हुए ये बातें बताईं।
उन्होंने बताया कि पुरुषों में लंग कैंसर सबसे आम कैंसर है। अधिकतर मामलों में धूम्रपान की लत और प्रदूषण के चलते लोगों में यह बीमारी होती है। धूम्रपान करने वालों के संपर्क में रहने वालों को भी यह बीमारी गिरफ्त में ले लेती है। बीमारी का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि इसका पता तब चलता है जब यह घातक रूप ले लेती है। क्षयरोग और सीओपीडी जैसे लक्षण वाली इस बीमारी की पहचान जल्द नहीं हो पाती। बायोप्सी जैसी तकनीक के आने के बाद इसकी पहचान आसान हुई है। कीमोथेरेपी इसके इलाज की प्रचलित तकनीक है। लेकिन अब नए शोधों के बाद इलाज के लिए नया कारगर तरीका ढूंढा गया है। इसमें मरीज के जीन की जांच कर देखा जाता है कि वह म्यूटेशन पॉजिटिव है या नहीं। मरीज के म्यूटेशन पॉजिटिव होने पर नई तकनीक का इस्तेमाल इलाज के लिए किया जा सकता है। इसमें मरीज को टायरोसीन किनेज इनहैबिटर (टीकेआई) की गोलियां देकर उसे चमत्कारिक लाभ पहुंचाया जा सकता है।
एमडी पैथोलॉजी डॉ. इरम ने ब्लड कैंसर की पहचान और उसके निदान की तकनीक पर चर्चा की। ऑंकोलॉजी विभाग के अध्यक्ष मेजर डॉ. एमक्यू बेग ने कैंसर के इलाज में रेडियोथेरेपी के इस्तेमाल की जानकारी दी। संचालन श्वास रोग विभागाध्यक्ष डॉ. अश्विनी मिश्र ने किया। इससे पहले प्रिंसिपल डॉ. गणेश कुमार ने सीएमई का उद्घाटन किया। इस दौरान डॉ. राकेश रावत, डॉ. ज्ञानचंद मौर्य, डॉ. मामून खान समेत शहर के कई चिकित्सक मौजूद रहे।
काफी सस्ता है नई तकनीक से इलाज
सामान्य तौर पर कीमोथेरेपी का खर्च जहां प्रति माह करीब 15,000 रुपये पड़ता है वहीं नई विधि से इलाज में खर्च दो से ढाई हजार रुपये महीना आता है।
ईजीएफआर टेस्ट जरूरी
एपीडर्मिक ग्रोथ फैक्टर रिसेप्टर (ईजीएफआर) टेस्ट से जीन म्यूटेशन का पता चलता है। इस टेस्ट के म्यूटेशन पॉजिटिव मिलने पर ही टीकेआई की गोलियों का इस्तेमाल होता है।