सत्येंद्र भारद्वाज
गोपालपुर। वे मंच पर हों तो श्रोताओं को खूब हंसाते हैं। अपने चुटीले व्यंग्य की मजमेबाजी से देश ही नहीं दुनिया के कई देशों तक चर्चित कवि दिनेश बावरा लेकिन जब अपने गांव गोला ब्लॉक के सिसई आते हैं तो अपनी पैतृक जमीन पर सपने बोते हैं। यह सपना है, पूर्वांचल के इस इलाके को जैविक खेती का अगुआ बनाना। शहरों की ओर भाग रहे युवाओं को गांव में रोकना और इस युवा ताकत की बदौलत गांवों की तकदीर बदलना।
दिनेश मिश्र बावरा ने जैवकि पद्धति से अरहर की ऐसी फसल तैयार की है जिसे एक बार बोकर पांच साल उपज हासिल की जा सकती है। रसायनमुक्त और किसानों के लिए बेहद फायदेमंद व्यवसायिक खेती की यह नजीर नील के बाद हल्दी, गन्ना आदि फसलों से मुंह मोड़ रहे इलाके के किसानों के लिए नई राह दिखा रही है। दिनेश ने तीन माह पहले एक एकड़ खेत में अरहर के पौधों की नर्सरी लगवाकर बेरोजगार युवाओं को नई दिशा दी। उन्होंने बताया कि कृषि वैज्ञानिक आकाश चौरसिया के निर्देश में अरहर की बुवाई की गई। रोजगार के लिए युवाओं का पलायन को रोकना इस पहल का उद्देश्य है।
वह खुद मुंबई से नियमित यहां आते हैं। खेत में काम करते हैं ताकि युवाओं का रुझान व्यवसायिक खेती में बढ़े।
दिनेश बावरा का मानना है कि जैविक खेती आज राष्ट्रीय और वैश्विक आवश्यकता है। भविष्य का सबसे बड़ा रोजगार भी यही होगा। यूरिया, डीएपी और फास्फेट जैसे रासायनिक खाद और कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल को भले हरित क्रांति कहा गया लेकिन खेत बंजर होने लगे। फसलों के साथ ये रसायन इंसानी शरीर में प्रवेश कर बीमारियों का कारण बनने लगे। तब दुनिया जैविक खेती की ओर देखने लगी। भारत की तो यह प्राचीनतम थाती है। इसलिए उन्होंने इसे चुना।
लागत कम और उपज ज्यादा
दिनेश बताते हैं कि एक एकड़ खेत को तैयार करने के लिए छह ट्राली जलकुंभी, एक क्विंटल चूना, चार ट्राली सूखा गोबर इस्तेमाल होता है। दोबारा हर साल खाद के रूप में सिर्फ गोबर डालना होगा। इतने बड़े खेत में सवा किलो बीज की जरूरत होगी। तीन से चार फुट की दूरी पर बीज रोपे जाते हैं। फसल छह माह में तैयार होगी। एक एकड़ में पहली बार में ही 12 से 15 क्विंटल की अरहर हासिल की जा सकती है। उसके बाद पौधे की टहनियों को कलम कर फिर तीन माह बाद उतनी ही उपज पाई जा सकती है। इस तरह से प्रथम कटान 6वें और दूसरी कटान 9वें महीने में क्रमवार पांच वर्षों तक कराकर उपज लाभ लिया जा सकता है।