संतोष सिंह
गोरखपुर।
गोरखपुर सदर और इलाहाबाद की फूलपुर संसदीय सीट के उप चुनाव पर भाजपा नया दांव खेल सकती है। इसके वैधानिक पहलुओं पर विचार चल रहा है। विपक्ष की रणनीति को पस्त करने के लिए ऐसी संभावना तलाशी जा रही है कि लोकसभा उप चुनाव से बचा जा सके। ऐसी संभावना है कि 2019 का लोकसभा चुनाव मोदी सरकार जुलाई या फिर अगस्त 2018 तक कराए। ऐसे में उप चुनाव के बहाने भाजपा विपक्ष को एकता दर्शाने का मौका नहीं देगी। ऐसा हुआ तो गोरखपुर और फूलपुर संसदीय सीट लंबे समय तक खाली रहेगी।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का विधान परिषद जाना लगभग तय है। परिषद के चुनाव बाद ही मुख्यमंत्री योगी गोरखपुर सदर और उप मुख्यमंत्री फूलपुर संसदीय सीट से इस्तीफा देंगे। भाजपा के सूत्रों ने बताया कि इस्तीफा 19 सितंबर को ही होगा, फिर गेंद लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन के पाले में चली जाएगी। इस्तीफा स्वीकार करने के लिए लोकसभा अध्यक्ष 15 दिन का समय ले सकती हैं। यानी दोनों सांसदों का इस्तीफा अक्तूबर तक स्वीकार किया जा सकता है। भाजपा इसी का फायदा उठाने की कोशिश में है। यदि रणनीति कामयाब हुई तो गोरखपुर और फूलपुर संसदीय सीट का उप चुनाव कराने के लिए मार्च 2018 तक समय मिल जाएगा। उप चुनाव के लिए चुनाव आयोग को छह महीने का समय मिलता है। यदि चुनाव एक साल के अंदर प्रस्तावित हों तो आयोग उप चुनाव स्थगित भी कर सकता है।
यूपी के विधान परिषद चुनाव में आयोग ने ऐसी ही एक नजीर पेश की है। आयोग ने जयवीर सिंह और अंबिका चौधरी के इस्तीफे से खाली हुई सीट पर चुनाव कराने से इंकार कर दिया है। आयोग ने कहा कि चुनाव के लिए एक साल से कम का समय बचा है, ऐसे में उप चुनाव कराना उचित नहीं है। यदि लोकसभा चुनाव समय से पहले हुआ तो चुनाव आयोग की यही थ्योरी गोरखपुर और फूलपुर संसदीय सीट पर लागू हो सकती है। भाजपा समय से पहले लोकसभा चुनाव कराने पर गंभीरता से विचार कर रही है। पार्टी की मंशा है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाएं। इससे चुनावी खर्च बचेगा। मोदी लहर का फायदा भी मिल सकता है। इसी का नतीजा है कि आगामी लोकसभा चुनाव के साथ ही भाजपा मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, गुजरात और मणिपुर का विधानसभा चुनाव करा सकती है। सभी राज्य भाजपा शासित हैं।
इस्तीफा न दिलवाना भाजपा की रणनीति का हिस्सा
मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री का सांसद पद न छोड़ना भाजपा की रणनीति का हिस्सा है। सूत्रों का कहना है कि विधान परिषद की पर्याप्त सीटें खाली हैं। यह भी तय है कि दोनों उच्च सदन में जाएंगे, फिर भी इस्तीफा नहीं दे रहे हैं। जानबूझकर मामले को खींचा जा रहा है ताकि उप चुनाव में जाने से बचा जा सके। पार्टी का मानना है कि इस्तीफा 19 सितंबर को हुआ तो स्वीकार होने में अक्तूबर का पहला सप्ताह आ जाएगा। ऐसे में अक्तूबर 2017 से मार्च 2019 के बीच उप चुनाव कराने की प्रक्रिया करनी होगी। लोकसभा चुनाव समय से पहले हुआ तो इस पर विचार नहीं किया जाएगा।