ट्रेन संचालन में अहम भूमिका निभाने वाली सिग्नल तथा संचार प्रणाली को और सटीक बनाने के लिए रेलवे ने यूनिवर्सल फेल सेफ ब्लॉक इंटरफेस (यूएफसीबीआई) डिवाइस की शुरूआत की है। इससे जहां एक ब्लॉक सेक्शन (दो स्टेशनों के बीच की दूरी) में सिग्नल फेल होने की नौबत टाली जा सकेगी, वहीं एक समय में एक ट्रैक पर एक ही ट्रेन की मौजूदगी सुनिश्चित होगी। ट्रैक पर मौजूद चिप पहियों की गिनती से यह भी सुनिश्चित करेगी पूरी ट्रेन (सारी बोगी) गुजर गईं। इस डिवाइस के इस्तेमाल से स्टेशन मास्टर को ऑटोमैटिक सिग्नल मिलेगा। पूर्वोत्तर रेलवे ने छपरा-थावे रूट पर सफल प्रयोग के बाद अब अन्य रेल खंडों में इसका दायरा बढ़ाने की शुरुआत कर दी है।
इस तकनीकी बदलाव से ट्रेन की आवाजाही के वक्त सिग्नल और लाइन क्लियर को लेकर स्टेशन मास्टर की केबिन, अगले स्टेशन के बीच संवाद के लिए फोन पर निर्भरता खत्म हो जाएगी। इससे संवाद में देरी और अस्पष्ट बयानी से जन्म लेने वाली चूक को टाला जा सकेगा। नई तकनीक दोनों ब्लाक उपकरणों के बीच मल्टीप्लेक्सर की तरह काम करते हुए आपरेशनल कमांड को एक ब्लाक उपकरण से दूसरे ब्लॉक उपकरण तक बिना गलती के पहुंचाने में कारगर मानी जाती है। इसे त्रुटि रहित बनाए रखने के लिए दोनों छोर पर ब्लॉक आपरेशनल पैनल से जुड़े उपकरणों को यूनिक आईडी अलॉट करने का प्रावधान किया गया है। साथ ही संचार माध्यम के लिए टेलीकॉम केबल, ऑप्टिकल फाइबर केबल (ओएफसी) और रेडियो लिंक के विकल्प होने से एक माध्यम फेल होने पर संचार सेवा खुद दूसरे मीडिया पर शिफ्ट हो जाने की विशेषता भी है। इससे संचार-सिग्नल फेल होने की नौबत नहीं आएगी। पटरियों में लगे एक्सल काउंटर आधारित संयंत्र से ट्रेनों के पहियों की गिनती होगी। ट्रेन गुजरने के बाद पहियों की संख्या के मिलान के बाद यह संयंत्र ऑटो लाइन क्लियर का संकेत देगा। स्टेशन मास्टर को अपने सामने मौजूद डिजिटल बोर्ड पर लाइन क्लियर का संकेत मिल जाएगा।
मऊ-इंदारा, भोजीपुरा-पीलीभीत में काम शुरू
यूनिवर्सल फेल सेफ ब्लॉक इंटरफेस (यूएफसीबीआई) डिवाइस मऊ-इंदारा और भोजीपुरा-पीलीभीत खंड के चार ब्लॉकों में प्रभावी हो गई हैं। बाकी ब्लॉकों में भी इस वर्ष के अंत तक लगाने का लक्ष्य है।
ट्रेनों को सुरक्षित चलाने में यूएफसीबीआई बहुत ही उपयोगी है। रेल मंत्रालय के मिशन जीरो एक्सीडेंट के अनुपालन में यह तकनीक मील का पत्थर साबित होगी। कोहरे के और आंधी-तूफान के दौरान सिग्नल-संचार में आने वाली बाधाओं को टालकर संरक्षित रेल संचालन में मदद मिलेगी। पूर्वोत्तर रेलवे में इसके प्रयोग की शुरुआत कर दी गई है। सभी रेल खंडों में इसे जल्द लगाया जाएगा।
- संजय यादव, सीपीआरओ, एनईआर