रवि राय
गोरखपुर।
राप्ती नदी के जलस्तर में भले ही गिरावट हो रही हो लेकिन बाढ़ का खतरा अभी टला नहीं है। सप्ताह भर से राप्ती के सभी बंधे पानी से पूरी तरह गीले हो जाने से कमजोर हो गए हैं। मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. गोविंद पांडेय का कहना है कि जिले के ज्यादातर बंधे मिट्टी के बने हैं । पानी का रिसाव बंधे की मजबूती के लिए खतरनाक होता है। जलस्तर कम होने से बंधे पर दबाव तो कम होगा, मगर जब तक पानी पूरी तरह से ना उतर जाए चैन की नींद नहीं सोया जा सकता है। बंधों पर रेनकट और रैटहोल उसकी मजबूती को ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं। दुर्भाग्यवश इनकी मरम्मत का काम कभी समय से पूरा नहीं होता है। मानसून से पहले इनकी मरम्मत होनी चाहिए, पर ऐसा नहीं होता। हर बार बाढ़ के अधिकतम जलस्तर को देखते हुए बंधों को थोड़ा ऊंचा कर खानापूरी कर ली जाती है। बंधों की निगरानी के लिए क्षेत्रीय समितियां बनाई जानी चाहिए। इसमें जनप्रतिनिधियों, स्थानीय लोगों के साथ प्रबुद्ध वर्ग और सिंचाई विभाग के अफसर, कर्मचारियों को शामिल किया जाना चाहिए। राप्ती और रोहिन नदी के बाढ़ का भी बंधों पर जबरदस्त दबाव है। बोक्टा बरवार बांध दोहरा दबाव झेल रहा है।
केस 1 :
बुधवार दोपहर बारह बजे नौसड़- एकला रिंग बांध के किनारे लल्ली पेड़ के नीचे बैठे थे। साथ ही गांव के 8-10 लोग भी। सभी बाढ़ पर चर्चा में मशगूल थे। वह बोल पड़े, राप्ती नदी का मुख्य बांध है, बाढ़ आने पर अफसर शहर बचाते है, गांव को कौन पूछता। राप्ती पुल से बाघागाड़ा तक बंधे पर दर्जनों कटान है। बांध धंस गए है, किनारे लगे पत्थर भी दब रहे है। पुरवा हवा ने कटान और तेज कर दी है। बोले- अब इन अफसरों को कौन बताए कि अभी खतरा टला नहीं है।
दिन के एक बजे बोक्टा- बरवार बांध पर बरवाखुर्द निवासी रामप्रसाद, अशोक कुमार दुबे, बघौचवीर बाबा स्थान के सामने बंधे के कटान रोकने के लिए बोरा लगा रहे थे। बोले 12 दिनों से पानी भरा है। जिससे बंधों में सीलन आ गई है। पुरवा, उत्तर की हवाएं तेजी से बंधो की मिट्टी काट रही हैं। एक फीट मिट्टी कट भी चुकी है। पानी के नीचे बंधों में कितनी कटान हुई यह तो भगवान ही जानता। जब भी हवा चल रही। धड़क ने तेज हो जा रही है। शुक्र है बरसात नहीं हो रही वर्ना जर्जर हो चुके इन बंधों को कोई बचा नहीं पाता।
केस 2-
दोपहर दो बजे बरहुआ : सिर पर पगड़ी बांधे राम गुलाब यादव भैंस चरा रहे थे। हाथ में लाठी थी और नजर राप्ती के पानी पर। कैमरे को देखकर बोल पडे़, बाढ़ आने पर लोगों को याद आती है। नदी सूखी रहती तो इंजीनियर आफिस में बैठकर बंधे की सुरक्षा आंकते हैं। बाढ़ आई है, आकर देखें काटन कहा हो रहा है, तब पता चलेगा खतरा कितना है। नदी में बने तीन ठोकर को अपनी लाठी से दिखाकर बोले, अगर यह नहीं रहता तो बंधा कभी का टूट गया होता। 1998 में बंधा यहीं टूटा था। उत्तर से चल रही हवा से कटान हो रही है। टेंट में पप्पू गोंड कहते है दो दिन पहले किसी बाहरी को आने की इजाजत नहीं थी। रात भर लोग बंधे की रखवाली करते हैं।
केस 3-
मलौनी बंधा : लहसड़ी के पास बुजुर्ग दूधनाथ निषाद एक टक नदी को निहार रहे थे। हलचल हुई तो अगल-बगल भी झांकने लगे। पास खड़े दो तीन नौजवानों की तरफ देखते हुए बोले बंधे को तो गांव के लोगों ने बचाया। पानी कम जरूर है, लेकिन खतरा कम नहीं हुआ है। ट्रांसपोर्ट नगर से लहसड़ी तक अगर पछुआ हवा चली तो बंधे में कटान शुरू हो जाएगी। बंधे में कई जगहों पर रिसाव हो रहा है। नदी से पानी जब कम होता है तो सबसे अधिक सतर्क रहने की जरूरत होती है।
प्लाटिंग के लिए बंाध काटकर बना दिया रास्ता
1998 की बाढ़ के बाद राप्ती पुल से सटे नौसड़-एकला रिंग बांध को मजबूत कर दिया गया। साथ ही वाराणसी रूट के समानंतर बने बंधे को दुरुस्त कराया गया ताकि रिंग बांध टूटने पर वाराणसी रूट बंद न हो। मगर प्रशासन की आंख में धूल झोंक नौसड़ के आगे एचपी पंप के पास किसी ने बंधे को काट दिया और प्लाटिंग के लिए रास्ता बना दिया। प्रशासन को इसकी भनक तक नहीं लगी। 1998 की बाढ़ में पेट्रोल पंप पूरी तरह तबाह हो चुका था। पास खड़े राजेंद्र कहते है कि रिंग बांध टूटा तो पानी गीडा तक पहुंच जाएगा। कुछ यहीं हाल बरहुआं का है। जिस जगह बंधा कटा था वहीं सुरक्षा को दरकिनार करते हुए प्लाटिंग कर दी गई। बंधे से करीब पचास फीट नीचे निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है। प्लाटिंग करने वालों की यह लालच कभी भी लाखों लोगों के लिए मुसीबत बन सकती है।