आठ महीने में मानचित्र के 60 फीसदी आवेदन निरस्त, पास सिर्फ 10 फीसदी
गोरखपुर। गोरखपुर विकास प्राधिकरण (जीडीए) में आठ महीने के भीतर मानचित्र स्वीकृत कराने के लिए आए 60 फीसदी आवेदन निरस्त कर दिए गए। महज 10 फीसदी आवेदन स्वीकृत हुए। जबकि, 30 फीसदी आवेदन लटके हैं जिन्हें स्वीकृत कराने के लिए आवेदक दौड़ लगा रहे हैं।
सबसे ज्यादा परेशान व्यावसायिक निर्माण कराने वाले बड़े बिल्डर और व्यवसायी आदि हैं। इनमें कई ऐसे हैं जिनके आवेदन पिछले चार-पांच महीनों से फंसे पड़े हैं। कुछ तो मानचित्र स्वीकृति के लिए सभी जरूरी प्रक्रिया पूरी होने का दावा भी कर रहे, मगर फाइल आगे भी फंसी न रह जाए इसलिए सामने आने से घबरा रहे हैं।
जीडीए से मिली जानकारी के मुताबिक एक मार्च 2019 से 31 अक्तूबर तक मानचित्र स्वीकृति के कुल 986 आवेदन आए। इनमें से 107 यानी करीब 10 फीसदी आवेदन स्वीकृत हुए जबकि 593 यानी करीब 60 फीसदी आवेदन निरस्त कर दिए गए। 286 आवेदन अब भी लटके हैं। प्राधिकरण की दलील है कि जरूरी सूचनाएं और दस्तावेज नहीं जमा करने की वजह से ये आवेदन लटके पड़े हैैं जबकि आवेदकों का कहना है कि उन्हें जबरन दौड़ाया जा रहा है। आपत्तियां दूर करने के बाद भी फाइल एक ही टेबल पर फंसी पड़ी है।
मानचित्र पास करने की समय सीमा तय
गोरखपुर। घर का मानचित्र पास कराने के लिए अब जीडीए में दौड़ना नहीं पड़ेगा। हर स्तर पर निस्तारण की समय सीमा तय कर दी गई है। आवासीय मानचित्र अधिकतम 30 दिन तो व्यावसायिक मानचित्र के आवेदन तीन महीने में निस्तारित करने का समय तय है। उपाध्यक्ष ए. दिनेश कुमार के अनुसार छह नवंबर से आवेदक को upobpas.in पोर्टल पर आवेदन करना है। इससे पहले पर upobps.in पर आवेदन किया जाता रहा है। इसका लिंक gdagkp.org पर भी उपलब्ध है। नए पोर्टल पर लो रिस्क के मानचित्र स्वीकार किए जाएंगे। हार्ड कॉपी की जरूरत नहीं पड़ेगी। इस पोर्टल से जुड़ी जानकारी के लिए प्राधिकरण के प्रथम तल स्थित कक्ष संख्या चार में एक हेल्प डेस्क भी बनाया गया है। उपाध्यक्ष ने बताया कि अवर अभियंता स्तर पर 15 दिन, सहायक नगर नियोजक या सहायक अभियंता, मुख्य नगर नियोजक, अधिशासी अभियंता स्तर पर तीन-तीन दिन, सचिव स्तर पर दो दिन तथा उपाध्यक्ष स्तर पर तीन दिन में निस्तारण करना होगा।
सचिव और उपाध्यक्ष पास करते हैं नक्शा
दो सौ वर्ग मीटर तक के आवासीय मानचित्र स्वीकृत करने का अधिकार जीडीए सचिव तो उससे अधिक के मानचित्र स्वीकृति का अधिकार जीडीए उपाध्यक्ष के पास है। इसके अलावा किसी भी तरह के व्यावसायिक निर्माण से जुड़े मानचित्र स्वीकृत करने की जिम्मेदारी भी उपाध्यक्ष के ही पास है।
आवेदन निरस्त होने पर बैठ चुकी है जांच
इसी साल की शुरुआत में शासन स्तर से हुई विकास प्राधिकरणों की समीक्षा में प्रदेश में सबसे ज्यादा 60 फीसदी मानचित्र स्वीकृति के आवेदन जीडीए में निरस्त होना पाया गया था। इसे गंभीरता से लेते हुए प्रमुख सचिव आवास एवं शहरी नियोजन ने तीन सदस्यीय कमेटी को मामले की जांच सौंपी थी। दो दिनों तक गोरखपुर में रहकर इस कमेटी ने मामले की जांच कर रिपोर्ट शासन को सौंपी। हालांकि यह रिपोर्ट न तो सार्वजनिक हुई और न ही इसमें कोई कार्रवाई हो सकी।
घूस लेते रंगे हाथ पकड़ी जा चुकी है कर्मचारी
मानचित्र स्वीकृति के लिए आवेदन की प्रक्रिया ऑनलाइन होने के बाद भी भ्रष्टाचार नहीं बंद हो रहा है। सर्वाधिक शिकायतें मानचित्र अनुभाग से ही जुड़ी हैं। ऊपर बैठे अफसरों को छोड़ दें तो जेई और एई स्तर पर आवेदकों को तब तक बेजा दौड़ाया जाता है जबतक कि उनकी मांग नहीं पूरी हो जाती। भ्रष्टाचार के ही मामले में करीब ढाई महीने पहले पांच सितंबर को मानचित्र अनुभाग में ही तैनात कनिष्ठ लिपिक दीपा प्रियदर्शी को एंटी करप्शन टीम ने 20 हजार रुपये घूस लेते रंगे हाथों पकड़ा था। उसका एक ऑडियो भी वायरल हुआ था जिसमें उसने कुछ जेई और एई के भी नाम लिए थे, मगर उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई।
शहर की 1700 एकड़ जमीन विनियमितीकरण की है। इसपर मानचित्र नहीं स्वीकृत किया जा सकता। इसकी जानकारी बहुत से लोगों को नहीं है और वे आवेदन कर देते हैं। इसी तरह कुछ लैंड यूज के विपरीत, ग्रीन लैंड, ओपेन एरिया, कृषि की जमीन पर भी आवासीय या व्यावसायिक मानचित्र नहीं स्वीकृत किए जा सकते हैं। किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाता है। कोई गड़बड़ी न हो इसलिए सभी नियम-मानकों की जांच की जाती है। कमियां पाए जाने पर उसे दुरुस्त करने के लिए कहा जाता है, जिसकी वजह से भी थोड़ी देर होती है। - ए. दिनेश कुमार, उपाध्यक्ष, जीडीए