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दर्द की दवा है, न बुखार की

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सिद्धार्थनगर। जिले के स्वास्थ्य केंद्रों पर बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का दावा हवा-हवाई साबित हो रहा है। हाल यह है कि पिछले छह महीने से जनपद के सात सामुदायिक और सात प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में दवाइयों की किल्लत चल रही है। मरीजों को न तो दर्द की दवा ही उपलब्ध हो पा रही है और न ही बुखार की दवा। विभिन्न कारणों से स्वास्थ्य केंद्रों पर स्थानीय स्तर पर भी दवाओं की खरीद नहीं हो पा रही है।
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जिले की 90 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। इन ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की बेहतर स्वास्थ्य सुविधा के लिए सीएचसी और पीएचसी खोले गए। इन स्वास्थ्य केंद्रों पर वर्तमान में मामूली दवाइयां भी उपलब्ध नहीं है। सीएचसी में 109 प्रकार और पीएचसी और 63 प्रकार की दवाएं होनी चाहिए। लेकिन सीएचसी पर महज 10 प्रकार की दवाएं और पीएचसी पर पांच प्रकार की दवाएं ही उपलब्ध हैं, जो दवाएं उपलब्ध हैं। उनमें आयरन की गोली, उल्टी की दवा, खुजली की दवा आदि शामिल हैं। बुखार, दस्त, बीपी आदि की दवाइयां यहां हैं ही नहीं। बांसी पीएचसी पर इलाज कराने आए श्यामनगर के जमाल अहमद ने बताया कि गले में दर्द था। डॉक्टर को दिखाया। लेकिन अस्पताल से दवा नहीं मिली। बताया गया कि दर्द की दवा नहीं है। पंतनगर के गिरीश मांझी ने बताया कि सीने में दर्द था। डॉक्टर ने परीक्षण कर लिया। लेकिन दवा सीएचसी पर नहीं मिली, ऐसे में मजबूरन बाहर से लेनी पड़ी। कुछ ऐसा ही हाल अशोगवा के भगवानदास ने बताया। कहा कि छह महीने में तीसरी बार दिखाना आया हूं। लेकिन हर बार बाहर से दवा खरीदना पड़ी। सुशीला ने कहा कि ढाई साल की बेटी शिवानी को खासी और बुखार है। लेकिन बच्चों की कफ सीरप तक नहीं है।

लखनऊ से ही नहीं आ रहीं दवाएं
सीएमओ डॉ आरके मिश्र ने बताया कि लखनऊ से ही दवाएं नहीं आ रहीं हैं। पिछले छह माह से दवाइयों की परेशानी सीएचसी और पीएचसी पर है। इसके लिए कई बार पत्राचार किया गया। अब सरकार कारपोरेशन के जरिए खुद ही दवा की खरीद कर रही है। इसकी वजह से थोड़ी देरी हो रही है। उम्मीद है कि फरवरी के अंतिम सप्ताह तक दवाएं उपलब्ध हो जाएंगी।
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