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मन के नियंत्रण का एक मात्र साधन योग

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गोरखपुर। विश्व विद्यालय के दर्शन शास्त्र के प्राचार्य प्रो. द्वारिका नाथ तिवारी ने कहा कि मन पर नियंत्रण का एक मात्र साधन योग है। योग कृत्रिम व्यवहार से मन की भावनाओं के नियंत्रण को नहीं कहता, अपितु सत्य के साक्षात्कार से जीवन को जानने का अवसर प्रदान करता है।
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तिवारी गोरखनाथ योग संस्थान एवं एमपी शिक्षा परिषद द्वारा अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर गोरखनाथ मंदिर में चल रहे योग प्रशिक्षण कार्यक्रम में अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। उन्हाेंने कहा कि महर्षि पतंजलि ने चित्त की वृत्तियों के निरोध को ही योग कहा है। योग में स्थूल एवं सूक्ष्म दोनों क्रियाएं होती हैं। सूक्ष्य क्रियाएं जैसे ध्यान, धारणा एवं समाधि में मन प्रधान होता है। इसका मुख्य उद्देश्य मन का निग्रह करके आत्मा के साथ योग करना होता है। योग जप-तप, तंत्र-मंत्र नहीं बल्कि यह एक मनोविज्ञान है, जो आध्यात्मिक स्तर पर परामनोविज्ञान हो जाता है। पश्चिम का मनोविज्ञान, जहां समस्याओं के समाधान के रूप में इस शास्त्र को देखता है, वहीं भारतीय योग शास्त्र आनंदपूर्ण जीवन जीने की विधा है। उन्होंने कहा कि मनोविज्ञान के रूप में योग विषय का शैक्षणिक अध्ययन नहीं हो रहा है। इस दिशा में प्रामाणिक प्रयोग एवं शोध की आवश्यकता है।
कटक उड़ीसा से पधारे महंत शिव नाथ ने कहा कि अंत:करण का परिमार्जन वैचारिक सुचिता एवं दिव्यता ही योग के मूलाधार है। सत, तम एवं रज तीनों प्रवृत्तियाें के मनुष्यों के लिए अपने चरम एवं परम लक्ष्य की प्राप्ति का एक मात्र साधन योग है।
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शिक्षा मनुष्य के निर्माण का सशक्त माध्यम
गोरखपुर। डा. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर में दर्शन शास्त्र के आचार्य डा. सरोज कुमार वर्मा ने कहा कि शिक्षा मनुष्य के निर्माण और समाज के विकास का सशक्त माध्यम है। वह चरित्र और जीवन का निर्माण करती है।
वे योग प्रशिक्षण कार्यक्रम के दूसरे सत्र में ‘शिक्षा का आदर्श एवं उद्देश्य ’ विषय पर अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। उन्होंने कहा कि वास्तविक जीवन मूल्यों की खोज में व्यक्ति की सहायता करना ही शिक्षा का मूल उद्देश्य है। यह मूल्य पूर्वाग्रह विहीन अन्वेषण तथा आत्म अवधान से ही आते हैं। जब आत्मबोध नहीं होता, तब आत्म अभिव्यक्ति अहंकार हो जाती है। उसके साथ ही उसके तमाम आक्रामक एवं महात्वाकांक्षी द्वंद उत्पन्न हो जाते हैं।
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