अमनदीप सिंह
गोरखपुर।
गोर्रा नदी की तबाही से झंगहा से बरहई के बीच बसे दर्जनों गांवों के लोगों के हौसले उस वक्त पस्त हो गए जब घर में जलाने के लिए माचिस की एक तीली तक न बची। एक तरफ खाने के लाले दूसरी तरफ कमर से ऊपर बढ़ते पानी ने लोगों को घर छोड़ने को मजबूर कर दिया। मौके पर साइकिल, स्कूटर, बैलगाड़ी, ट्राली जो भी वाहन मिला, उस पर घरेलू सामान लादकर चल दिए सुरक्षित स्थान की ओर। अधिक से अधिक सामान बचा लेने की जद्दोजहद में परिवार के हरेक सदस्य के हाथ, कंधे और यहां तक कि सिर पर भी सामान की पोटली थी। बाढ़ पीड़ित प्रशासन से कोई मदद न मिलने पर नाराज नजर आए।
सोनबरसा गांव के रहने वाले रमेश जायसवाल ने बताया कि तीन दिन से प्रशासन की कोई मदद नहीं मिली। बोट पर सवार बचाव कर्मी दूर से हाथ हिलाकर हाल पूछते और लौट जाते रहे। पास आकर किसी ने उनका दर्द न जाना। जब पानी कमर से ऊपर चढ़ने लगा और जलाने के लिए माचिस की एक तीली भी नहीं बची तो घर छोड़ने को मजबूर होना पड़ा। गांव कोना निवासी जय सिंह ने कहा कि राहत कार्य बहुत धीमा है। न खाना मिल रहा, न ही कोई बाढ़ से निकालने आया। हम लोग खुद ही हिम्मत करके बाहर पहुंचे। सबना टोला गाव निवासी बिरजू अपनी पत्नी, मां, तीन बच्चों और बकरियों के साथ सिर पर बोरा उठाए दो किलोमीटर पानी के बीच से निकलकर आए। सोनबरसा गांव के राहुल ने कहा कि प्रशासन ढीला पड़ा हुआ है। लोग बहुत बेबस हैं।
बाढ़ के बीच कंधों पर खींच लाए बैलगाड़ी
प्रशासन की ओर से जब मदद नहीं मिली तो बरगदवां निवासी भोलू, कुलदीप और सकलदीप अपने भाइयों के साथ कंधे पर घरेलू सामान से लदी बैलगाड़ी खींच लाए। दो किलोमीटर तक उन्होंने बारी-बारी दो क्विंटल वजन खींचा। इनका कहना था कि कल से मदद का इंतजार कर रहे हैं। पानी गर्दन तक आ गया पर कोई झांकने नहीं आया। ऐसे में हम बर्तन, कपडे़ आदि बैलगाड़ी पर लादकर खुद ही सुरक्षित स्थान पर जाने को मजबूर हो गए।
अफसरों और विधायक पर जताई नाराजगी
बरगदवां निवासी संदीप यादव कुछ घंटे पहले मौके पर मुआयना कर जा चुके अधिकारियों पर जमकर भड़के। उन्होंने विधायक को भी कोसा। कहा, घर में रखा गेहूं, चावल, आटा खराब हो गया। बिजली के उपकरण बर्बाद हो गए। 36 घंटों में कोई हाल जानने भी नहीं आया। चूल्हा जलाने को ईंधन नहीं बचा। लकड़ी आदि सब बाढ़ में बह गया।
खाना न मिलने पर हुई निराशा
बाढ़ से सुरक्षित स्थान पर पहुंचे लोगों का गुस्सा उस वक्त फूट पड़ा जब खाने के लिए पैकेट तो आए, लेकिन एक अधिकारी ने खाना बांटने से मना कर पैकेट नेहरू इंटर कॉलेज के राहत शिविर में भेजने को कह दिया। इससे नाराज लोगों का कहना था कि जब सभी लोग बाढ़ प्रभावित हैं तो फिर खाना देने में एतराज क्यों?
स्कूल के खाने के पैकेट से मिटाई भूख
बचाव कार्य स्थल के आसपास बाढ़ग्रस्त लोग भूख से व्याकुल थे। इसी बीच दोपहर में डिवाइन पब्लिक स्कूल बिछिया से अविनाश, अनिल, संजय और अमित खाने के 700 पैकेट लेकर पहुंचे। खाना मिलते ही लोगों के चेहरे खिल गए। खाने के पैकेट में आठ पूरी, आलू की सब्जी और पानी की बोतल थी।