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आज खतरे का निशान पार कर जाएगी राप्ती

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गोरखपुर। राप्ती के जलस्तर में लगातार हो रही वृद्धि से बुधवार को यह खतरे का निशान पार कर सकती है। 11 सेंटीमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से पानी का जलस्तर बढ़ रहा है। राप्ती अब खतरे के निशान से कुछ सेंटीमीटर ही दूर है। राप्ती अगर खतरे का लाल निशान पार करती है तो आसपास के क्षेत्रों में बसे गांवों, कस्बों, रिहायशी इलाकों और खेती से जुड़ें हिस्सों को इसका पानी पहुंच जाएगा, जिसस भारी नुकसान होने की आशंका है। इसके अलावा घाघरा, कुआनो और रोहिन नदियों का जलस्तर भी बढ़ रहा है।
सिंचाई विभाग की ओर से स्थापित कंट्रोल रूम से मिले आंकड़ों के मुताबिक मंगलवार शाम 4 बजे राप्ती राप्ती का जलस्तर 73.170 मीटर था। इसके बाद रात 8 बजे यह 73.280 मीटर पर पहुंच गया। मानकों के मुताबिक राप्ती के खतरे का निशान 74.98 मीटर पर है। इससे सटे गांव बहरामपुर के लोगों में दहशत है। उनका कहना है कि जब भी तेज बारिश होती है। 1998 की बाढ़ का मंजर याद आ जाता है।
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नदियाें का जलस्तर (मीटर में)
राप्ती बर्डघाट में 73.280 खतरे का निशान 74.98
घाघरा कतरनिया घाट 134.960 खतरे का निशान 136.78
रोहिन तिनमुहानी घाट 82.300 खतरे का निशान 82.44
कुआनो चंद्रदीप घाट 88.620 खतरे का निशान 88.84


सहम जाता है परिवार
परिवार के लोग तेज बारिश होने पर उठ जाते हैं और रात जागकर काटनी पड़ती है। डर लगा रहता है कि कहीं अचानक से पानी न आ जाए और वे सोये हुए हों, तो फिर संभल न पाएं।
-सारसती, बहरामपुर

प्रशासन को पहले संभलने की जरूरत
राप्ती में पानी तेजी से बढ़ रहा है। प्रशासन अभी तक कुंभकरण की नींद सोया है। सुरक्षा के लिहाज से कोई इंतजाम नहीं है। मौके पर कोई आपदा होती है तो लोगों के लिए बच पाना मुश्किल हो सकता है।
- संजना चौहान, बहरामपुर

बोट कंडम, कैसे होगा बचाव
योगी आदित्यनाथ ने 1998 से पहले लोगों के बचाव में चार बोट दी थीं। उनका इस्तेमाल तो बहुत कम हुआ। लेेकिन रखरखाव न होने से ये कंडम हो गई हैं। चुनौती इस बात की है कि बचाव कार्य कैसे होगा।
- ध्रुव निषाद, बहरामपुर

चौकी बन गई खंडहर
बाढ़ राहत पुलिस चौकी से दो पुलिसकर्मी जब से रिटायर्ड हुए हैं, उसके बाद से कोई नहीं आया और चौकी खंडहर बन गई है, जो कभी भी ढहकर मलबे में तब्दील हो सकती है।
- जयराम, बहरामपुर

पानी बढ़ने पर छोड़ना पड़ता है स्थान
राप्ती किनारे स्थित मंदिर में रहता हूं। जब पानी बढ़ जाता है तो रुकना बहुत मुश्किल होता है। ऐसे में मंदिर छोड़कर पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
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- महावीर दास

याद आता है 1998 का मंजर
तेज बारिश होती है तो 1998 की बाढ़ का मंजर याद आ जाता है। राप्ती में जलस्तर बढ़ने पर लगातार नजर बनाए रखनी पड़ती है। घर के लोग टीवी, रेडियो से चिपके रहते हैं और लगातार हाल जानते रहते हैं।
- राजिंद्र साहनी, बहरामपुर
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