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शहीद के गांव का बच्चा-बच्चा बदला लेने को तैयार

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पाकिस्तान का पुतला फूंकते गांव के नौजवान। - फोटो : Amar Ujala
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गोरखपुर।
शहीद साहब शुक्ला के घर से चार किलोमीटर पहले कसिहार मोड़। यहीं पर ऑटो वाले से शहीद के घर का पता पूछा। उसने गर्मजोशी से उनके दरवाजे तक जाने का रास्ता बताया। शहीद के गांव के पहले मलांव चौराहा पर पते की तसदीक के लिए रुके तो चाय की दुकान पर भी साहब की शहादत की बातें चल रही थीं। उनको बचपन से जानने वाले हरिकांत मिश्र बोले, कभी उन्हें नाराज होते नहीं देखा। उनकी शहादत पर पूरे इलाके को गर्व है, लेकिन उन्हें खोने का दुख भी है। थोड़े फासले के बाद आया शहीद का गांव रुदाइन उर्फ मझगांव।

राप्ती के किनारे बसा गांव, आज कुछ मायूस सा था। बंधे पर खड़े लोगों के चेहरे उदास थे। करीब 100 मीटर दूर शहीद का घर था। यहां तक जाने के लिए कीचड़ भरी कच्ची सड़क को मिट्टी पाटकर आने जाने लायक बनाया गया था। बगल में खड़े कुछ लोग आपस में उस आतंकी वारदात की बात कर रहे थे, जिसमें साहब शहीद हुए थे। गांव के शैलेश तिवारी ने स्कूल में छिपे आतंकियों के खिलाफ जारी ऑपरेशन का ताजा हाल पूछा तो सदानंद ने जानकारी न होने की बात कही। तभी ऋषभ शुक्ला और घनश्याम वहां पहुंचे और स्कूल में छिपे दोनों आतंकियों के मारे जाने की खबर दी। ऋषभ ने यहीं जोड़ा, आतंकियों से बदला लेने के लिए शहीद साहब शुक्ला के गांव रुदाइन उर्फ मझगांव का बच्चा-बच्चा तैयार है।
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पुतला फूंका, लगे पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे
बेलीपार क्षेत्र के रुदाइन उर्फ मझगांव गांव के लोगों में अपने सपूत साहब शुक्ला की शहादत पर गर्व तो है, मगर उनमें पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद पर गुस्सा भी बहुत है। यही वजह थी कि गांव के लोगों ने न सिर्फ पाकिस्तान का पुतला फूंका बल्कि विरोध में पाक मुर्दाबाद के नारे भी लगाए। यही नहीं, लोग आतंकवाद और पाकिस्तान के खात्मे के लिए सेना को पूरी छूट देने की भी वकालत कर रहे थे। पुतला फूंकने वालों में आशीष साहनी, लव कुमार, विशाल साहनी आदि युवा शामिल थे। कभी ये चेहरे अपने अजीज को खोने से दुखी नजर आए तो कभी आतंकियों की काली करतूत याद करके तमतमा उठ रहे थे। भले ही चंद मिनटों में पाकिस्तान का पुतला राख हो गया हो पर पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाने के बाद भी लोग नाराज नजर आ रहे थे।

वक्त के साथ बढ़ती गई शहीद के घर भीड़
शहीद के दरवाजे पर रिश्तेदारों और गांववालों की भीड़ थी। बाहर साहब के परिवारवाले घर आने वालों को आतंकी वारदात के बारे में बता रहे थे। बड़े बेटे सौरभ शुक्ला सूचना पाकर सुबह ही मुंबई से लौटे थे। सौरभ अपने भाई देवाशीष और कुछ रिश्तेदारों के साथ पिता का पार्थिव शरीर लेने के लिए गोरखपुर एयरपोर्ट निकल रहे थे। उन्होंने बताया कि प्रशासन की ओर से साढ़े चार बजे तक पापा का पार्थिव शरीर गोरखपुर आने की जानकारी दी गई थी। इस बीच शहीद के घर पुलिस और प्रशासन के अफसरों का आना-जाना लगा था। लोग देश के वीर सपूत के दर्शन पाने का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे।
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आतंक को बल देने वाली सियासत से दुखी थे पापा : विभ्राट
शहीद के दूसरे बेटे विभ्राट के आठ-दस दोस्त सूचना पाकर गोरखपुर से गांव पहुंचे थे। विभ्राट उन्हें पापा पर हुए आतंकी हमले के बारे में बता रहे थे। आदित्य ने कश्मीर में पत्थरबाजों को सेना और सुरक्षा बलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बताया तो विभ्राट ने भी इस पर हामी भरी। बताया, घंटे-घंटे भर पापा से बात होती थी। पत्थरबाजों के बीच से चलती गोलियों का वह जिक्र करते थे। बताते थे कि आतंकियों का पीछा करने पर पथराव होने लगता है। हम पत्थरबाजों पर गोली चला नहीं सकते लेकिन वो पत्थरबाजों के बीच से हम पर गोली दाग देते हैं। पापा कश्मीर में आतंक को मददगार बनने वाली सियासत का जिक्र कर काफी दुखी होते थे।
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