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वर्दी पहनकर बॉर्डर पर जाने को बेचैन शहीद के बेटे

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शहीद के प‌ार्थिव शरीर के गांव पहुंचने पर डीएम ने भी उसे कंधा दिया। - फोटो : Amar Ujala
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अवनीश त्रिपाठी
गोरखपुर।
आतंकियों के हमले में सीआरपीएफ के सब इंस्पेक्टर साहब शुक्ला की शहादत ने उनके बेटों को बेचैन कर दिया है। पर ये बेचैनी कुछ अलग तरह की है। पिता के बाद अब उनके तीन लाल वर्दी पहनकर बॉर्डर पर जाने को बेताब हैं। शहीद के बड़े बेटे सौरभ प्राइवेट जॉब में हैं लेकिन उनसे छोटे उनके तीन भाई फोर्स में भर्ती होने की तैयारी कर रहे हैं। पिता की शहादत के बाद अब वीर सपूत के ये तीनों लाल सेना में जाकर आतंकियों से लोहा लेने के लिए बेताब हैं।
पिता की शहादत पर गर्व के साथ उन्हें खोने का दुख इनके चेहरों पर साफ दिख रहा था। कभी नयनों के कोर भीगने को आतुर होते तो शहीद साहब के ये लाडले खुद को झट से संयत कर ले रहे थे। सबसे छोटे विराट ने बताया कि तीनों भाई जंगल धूसड़ में एमपी कॉलेज मैदान में फोर्स की भर्ती की तैयारी के लिए रोज दौड़ लगाते हैं। पापा की तरह उनका भी सपना सैनिक बनकर देश की सेवा करने का है। अब पिता की शहादत के बाद विराट ने वर्दी हासिल करने को जुनून बनाने की बात कही। कहा कि पिता के नक्शे कदम पर चलकर वह देश का नाम ऊंचा करेंगे। ऐसी ही बातें देवाशीष और विभ्राट ने भी कीं।
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आतंकी गाजी को मारने वाले की बहन अब शहीद की बीबी
शहीद के घर रविवार की सुबह एसडीएम और सीओ पहुंचे। जार-जार रो रही शहीद की पत्नी शुभा शुक्ला से खुद को संभालने का अनुरोध किया तो कुछ देर में वह संयत हुईं। एसडीएम से बेटों की बेरोजगारी का जिक्र किया और सरकार से उनके लिए कुछ करने की अपील की। इस बीच किसी ने एसडीएम से मुख्यमंत्री आदित्यनाथ को अंत्येष्टि में बुलाने का अनुरोध किया। एसडीएम ने डीएम के जरिए सभी बातों को शासन तक पहुंचाने की बात कही। इस पर शहीद की पत्नी बोलीं, योगी जी को सिर्फ इतना बता दीजिएगा कि संसद हमले को अंजाम देने वाले आतंकी गाजी बाबा को मारने वाले वीर नरेंद्र नाथ धर द्विवेदी की बहन ने उन्हें बुलाया है।

वीरता पर सिपाही से बन गए अफसर
झारखंड में नक्सली क्षेत्र में ड्यूटी के दौरान करीब 13-14 साल पहले भी साहब शुक्ल पर हमला हुआ था। नक्सलियों ने उनकी गश्ती वाहन को घेर कर फायरिंग की थी। इसमें उनके सभी साथी शहीद हुए थे। साहब शुक्ल ने नक्सलियों से लोहा लिया था और उन्हें मार गिराया था। साहब के बचपन के साथी मार्कंडेय मणि बताते हैं कि तब उन्होंने अकेले सात नक्सलियों को मार गिराया था। इस पर उन्हें प्रमोशन मिला था और इसी वीरता के चलते वह सिपाही से अफसर बने।
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संघर्षों में बीता बचपन
नदी किनारे 12 बीघे जमीन, जिस पर साल में सिर्फ एक फसल ही होती है। यह साहब की पैतृक जायदाद है। इसमें परिवार की जरूरत पूरी करना कठिन था। साहब ने आठवीं पास की और एक दोस्त के साथ भर्ती देखने चले गए। यहां उनका सेलेक्शन हो गया। अभी उन्होंने तीन महीने ही ट्रेनिंग ली थी कि पिता रामबिलास शुक्ल का देहांत हो गया। पिछले साल माता सीता देवी का भी निधन हुआ। गांव में तीन कमरे के पैतृक मकान के अलावा जंगल धूसड़ में इतना ही बड़ा एक मकान साहब ने अपनी कमाई से बनवाया था।
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