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कुशीनगर: ज्योति-नेहा के संघर्ष में समाज का सहारा

Fri, 25 Jan 2019 12:06 AM IST
राकेश पांडेय अमर उजाला ब्यूरो
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अपराजिता मुहिम के तहत अमर उजाला के पडरौना कार्यालय पर बेटी दिवस के अवसर पर आयोजित समारोह में कसया की सगी बहनों ज्योति और नेहा को सम्मानित किया गया। - फोटो : अमर उजाला
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पडरौना। फालिज से बिस्तर पर पड़ा पिता। और घर में झांकती भूख। लोग क्या कहेंगे, का डर। छोटी सी उम्र लेकिन बड़ी हिम्मत। और ज्योति ने पिता का सैलून खुद चलाने का फैसला कर लिया। बाद में बहन नेहा भी साथ देने लगी। लड़कियों को ग्राहकों की दाढ़ी-बाल बनाते देखते तो कुछ दंग रह जाते तो कुछ ताने देते। क्या-क्या न सुना। न केवल वे लाचार पिता का सहारा बन गईं बल्कि विपरीत परिस्थितियों में हौसले और संघर्ष का प्रतीक भी। अपराजिता....जिसने जिंदगी की लाचारियों पर जीत हासिल की।
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अमर उजाला ने अपने अभियान अपराजिता के मंच पर कसया नगर पालिका के बनवारी टोला की रहने वाली सगी बहनों ज्योति शर्मा (18) और नेहा शर्मा (16) का अभिनंदन कर राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया। पडरौना कायार्लय में बृहस्पतिवार को हुआ समारोह सादा था लेकिन शहर की चुनिंदा हस्तियों की उपस्थिति ने इसे गरिमामय बना दिया।

प्रतिष्ठित व्यवसायी एवं समाजसेवी दीप नारायण अग्रवाल ने दोनों बहनों को अभिनंदनस्वरुप उन्हें 5000-5000 रुपये की सम्मान राशि भेंट की। हनुमान इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य शैलेंद्र दत्त शुक्ल और प्रबंधक मनोज शर्मा, रीयल पैराडाइज की प्रधानाचार्या डॉक्टर सुनीता पांडेय, स्योबाई कमला देवी टिबड़ेवाल कन्या इंटर कॉलेज की प्रधानाचार्या मुकुल शुक्ला, बाल कल्याण समिति की अध्यक्ष दीपाली सिन्हा, पूर्वांचल किसान यूनियन के अध्यक्ष पप्पू पांडेय, शिक्षिका श्वेता सहानी और पूनम गुप्ता ने भी इनके जज्बे को सलाम किया। सबने कहा, ये बेटियां कुशीनगर की शान हैं। इन्होंने कहा कि ये आगे जो भी करना चाहें, उन्हें उनका पूरा सहयोग मिलेगा।
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एक वादा ऐसा कि पिता की आंखें छलक पड़ीं
बीमार पिता ध्रुव नारायण शर्मा ने बेटी ज्योति और नेहा पर नाज जताया, लेकिन उनके भविष्य और शादी की चिंता जताई। समाजसेवी दीप नारायण अग्रवाल ने उन्हें भरोसा दिलाया कि बेटियां जो भी पढाई करना चाहे, उसका खर्च वह उठाएंगे। वह तीनों (ज्योति-नेहा की एक छोटी बहन भी है) बेटियों की शादी की चिंता छोड़ दें। होनहार बेटियों की शादी वह अपने खर्च से कराएंगे। यह सुनकर पिता की आंखें खुशी से छलक उठीं।

यह रही संघर्ष कथा
ध्रुव नारायन शर्मा बनवारी टोला में गुमटी में सैलून चलाते थे। उनकी सात बेटियों में बडी रंजना, बबिता, कविता और ममता की शादी हो चुकी है। ज्योति जब छोटी थी, तभी दुकान पर पिता के काम में हाथ बंटाती थी। तीन साल पहले पिता के शरीर के बाएं हिस्से में फालिज पड़ा। वह काम करने लायक नहीं रहे।

तब ज्योति ने इंटर करने के बाद पढ़ाई छोड़ घर का खर्च चलाने के लिए पिता का सैलून संभाल लिया। उसकी मदद को 11 वीं में पढने वाली बहन नेहा भी आ गई। लोगों की आलोचना से बेपरवाह दोनों बहनें अपने काम में जुटी रहीं। समाजसेवी डॉक्टर जेपी शर्मा की मदद वे कसया में व्यूटीशियन का कोर्स कर रही हैं। छोटी गुंजन (15) दसवीं में है।
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हम समाज को यह बताना चाहती हैं कि बेटी और बेटों में कोई फर्क नहीं होता। कोई ऐसा काम नहीं है, जो बेटियां कर नहीं सकतीं।
-ज्योति और नेहा
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