गोरखपुर। दो दिवसीय (9-10 दिसंबर) दौरे पर आए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने सोमवार को गोरखपुरवासियों से खुद को जोड़ा। उन्होंने कहा कि गोरखपुर से पुराना नाता है। राष्ट्रपति बनने के बाद पहली बार आए हैं। जो कुछ देखा, उससे कह सकता हूं कि गोरखपुर बदल रहा है।
महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद के मुख्य महोत्सव और सम्मान समारोह में आए राष्ट्रपति ने कहा विकास कार्यों से जनता को असुविधा होती है लेकिन काम पूरा होने के बाद अच्छा लगता है। 20 सालों में कई बार गोरखपुर आया हूं। अब और तब के गोरखपुर में बड़ा बदलाव दिख रहा है। एम्स का निर्माण तेजी से चल रहा है। जल्द ही गोरखपुर स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा का बड़ा केंद्र बन जाएगा। गुरु गोरखनाथ की स्मृति से जुड़े, राप्ती और रोहिन नदी के किनारे बसे इस शहर में आना सौभाग्य की बात है। यह सौभाग्य हमें मिला है।
महापुरुष, संत और कवियों को भी याद किया
राष्ट्रपति ने गोरखपुर और आसपास के जिलों से संबंधित महापुरुषों को भी याद किया। कहा कि परमहंस योगानंद का जन्म गोरखपुर में हुआ था। हजरत रोशन अली शाह, मोहम्मद सैय्यद हसन, बाबू बंधु सिंह और राम प्रसाद बिस्मिल का संबंध गोरखपुर से था। यह शहर बाबा राघव दास जैसे राष्ट्र सेवी संत, महान साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद की कर्मस्थली भी रहा है। मुंशी प्रेमचंद के कथा संसार में गोरखपुर के ग्रामीण अंचल की झलक दिखाई देती है। फिराक गोरखपुरी ने इस शहर का नाम उर्दू साहित्य में अमर कर दिया है। इस क्षेत्र का सौभाग्य है कि गौतम बुद्ध से जुड़ा कुशीनगर और संत कबीर जुड़ा मगहर है। दोनों महान शिक्षक थे।
नाथ पंथ योगी जनजागरण के सूत्रधार
उन्होंने कहा कि आजादी की लड़ाई के दौरान राष्ट्रीय-स्वाभिमान से जुड़ी आधुनिक शिक्षा देने की मुहिम शुरू हुई थी, तभी महंत दिग्विजय नाथ ने महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद (1932) की स्थापना की थी। यह गोरखपुर और पूर्वी उत्तर प्रदेश में शिक्षा के विकास को गति, दिशा देने में मील का पत्थर साबित हुआ। भक्ति आंदोलन से 1857 के स्वाधीनता संग्राम तक नाथ पंथ योगी जनजागरण के सूत्रधार रहे हैं। समाज की एकता, देश की अखंडता और अशिक्षा से मुक्ति दिलाने की गोरक्षपीठ की मुहिम अतुलनीय है। सकारात्मक सोच का ही नतीजा था कि शिक्षा परिषद ने अपने दो महाविद्यालयों को पंडित दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय को दे दिया। राष्ट्रपति ने ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ से अपने रिश्तों को याद किया। उन्होंने कहा कि संसद में एक साथ काम करने का मौका मिला था।
गीता प्रेस को अमूल्य धरोहर बताया
राष्ट्रपति ने गीता प्रेस को अमूल्य धरोहर बताया और कहा कि 1923 में स्थापित इस प्रेस से 62 करोड़ से अधिक धार्मिक साहित्य छप चुका है। कल्याण पत्रिका के पहले संपादक हनुमान प्रसाद पोद्दार ने संस्कार निर्माण, समाज को सात्विक ऊर्जा प्रदान की।