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शांति और प्रेम का संदेश दे गया प्रतिरोध का सिनेमा

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नफरत और हिंसा के प्रति सचेत कर गया ‘प्रतिरोध का सिनेमा’
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शांति और प्रेम का संदेश दे गया ‘प्रतिरोध का सिनेमा’
गोकुल अतिथि भवन में आयोजित 13वें गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल का हुआ समापन
अमर उजाला ब्यूरो
गोरखपुर। नफरत, हिंसा और उन्माद के प्रति सचेत करते हुए 13वां गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल रविवार को शांति और प्रेम का संदेश देकर समाप्त हुआ। बच्चों के सत्र में कार्लोस सलदान्हा निर्देशित एनिमेशन फिल्म ‘फर्दीनांद’ ने हिंसा तो गोरखपुर के वैभव शर्मा के निर्देशन में बनी ‘अद्धा टिकट’ ने बाल मजदूरी के विरोध में आवाज उठाई। मो. गनी निर्देशित शार्ट फिल्म ‘गुब्बारे’ में गुब्बारे बेचने वाली एक लड़की की दिल को छू लेने वाली कहानी देख दर्शक भावुक हुए। इसके अलावा चार दस्तावेजी फिल्में भी दिखाई गईं।
इन फिल्मों का हुआ प्रदर्शन
फर्दीनांद : यह एक ऐसे बैल की कहानी है, जिसे बुल फाइटिंग पसंद नहीं। पिता जब बुल फाइटिंग के लिए विदा होते हैं तो वह पूछता है कि क्या बिना लड़े कोई जीत नहीं सकता। बुल फाइटिंग के मैदान से फूलों की घाटी तक का उसका सफर बच्चों को अमन और प्रेम का संदेश दे गया।
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अद्धा टिकट : फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों के दर्द और फैक्ट्रियों में बाल मजदूरों के शोषण के विरोध में आवाज उठाती इस फिल्म में अभिनय करने वाले बच्चे हकीकत में फुटपाथ पर रहने वाले हैं।
गुब्बारे : पिता की दुर्घटना के कारण लड़की गुब्बारे बेचने को मजबूर है, पर उसके गुब्बारे कोई नहीं खरीदता। पार्क में बैठा वृद्ध उसकी मदद करने के लिए सारे गुब्बारे खरीद कर उन दोस्तों को याद करके आसमान में उड़ा देता है, जो अब संसार में नहीं हैं। दोनों के भाव गहरे संदेश दे गए।

हू इज तापसी : गोरखपुर के फिल्मकार विजय प्रकाश की यह फिल्म कुशीनगर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तापसी कुशवाहा की कहानी बताती है। उन्होंने अपने प्रयास से इलाके को हराभरा बनाया था। यह फिल्म आखिरी दिनों में हुई उपेक्षा के साथ ही व्यवस्था के प्रति व्यक्ति के आक्रोश दिखाती है।
दोज स्टार्स इन द स्काई : ओड़िसा के फिल्मकार देबरंजन सारंगी की यह फिल्म किसानों की जमीन की कारपोरेट लूट और हिंसा को सामने लाती है। यह आम विश्वास है कि जब लोग मरते हैं तब वे आसमान में तारे बन जाते हैं। फिल्म इसी आम विश्वास के सहारे बेहतर ढंग से गढ़ी गई है।

लिंच नेशन : 2018 में चलती ट्रेन में जुनैद (16) की भीड़ ने हत्या की थी। दिल्ली के स्वतंत्र पत्रकार अशफाक ने फुरकान अंसारी, विष्णु सेजवाल और शाहीद अहमद के साथ पूरे देश में ‘माब लिंचिंग’ की घटनाओं को सहेजकर यह दस्तावेजी फिल्म बनाई है। इसने दर्शकों को बेचैन किया।

परमाणु ऊर्जा-बहुत ठगनी हम जानी : दस्तावेजी फिल्मकार फातिमा निजारुद्दीन की फिल्म मजाकिया और चुटीले अंदाज में देश के परमाणु ऊर्जा प्रोजक्ट की असलियत को सामने लाती है।
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लैंडलेस : पंजाब के फिल्मकार रणदीप मडडोके की यह फिल्म पंजाब के भूमिहीन दलित कृषि मजदूरों की व्यथा और उनके संगठित होने की दास्तान दिखाती है। फिल्म के संपादक साहेब सिंह इकबाल और कंसल्टिंग संपादक अमनिंदर सिंह प्रदर्शन के बाद दर्शकों से रूबरू हुए।
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