भारत का लोकतंत्र साम्राज्यवादी और पूंजीवादी विदेशी सत्ता से सतत संघर्ष का परिणाम है। इस संघर्ष में न जाने कितने बलिदानियों ने प्राण अर्पित किए, तब जाकर भारतवर्ष को श्रेष्ठतम लोकतांत्रिक दस्तावेज के रूप में संविधान मिला।
ये बातें गोरखपुर यूनिवर्सिटी के विधि संकाय में राष्ट्रीय विधि दिवस पर आयोजित ‘संविधान : कल आज और कल’ विषयक एकल व्याख्यान में मुख्य वक्ता दीवानी न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक नारायण धर दुबे ने कहीं। उन्होंने कहा कि जहां राजनैतिक अधिकारों और शक्तियों के दुरुपयोग के कारण संविधान का मूल स्वरूप परिवर्तित होने का खतरा रहता है, वहां भारत की सर्वोच्च न्यायपालिका हमेशा सजग प्रहरी की तरह खड़ी रहती है। विशिष्ट अतिथि सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता अनुपम मिश्र ने कहा कि देश की प्रगतिशीलता में भारतीय संविधान कभी रुकावट नहीं बना, बल्कि इसने तो राष्ट्र की चतुर्दिक उन्नति के विधिक सिद्धांतों स्थापित किए हैं। प्रो. अहमद नसीम समेत कुछ अन्य वक्ताओं ने भी विचार व्यक्त किए। अध्यक्षता संकायाध्यक्ष प्रो. जितेंद्र मिश्र ने की।
पोस्टर प्रदर्शनी भी लगी
इस अवसर पर पोस्टर प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया। इसमें बड़ी संख्या में विधि छात्रों ने सामयिक विषयों पर आधारित पोस्टरों का प्रदर्शन किया और इनके माध्यम से अनेक सामाजिक और विधिक मुद्दे उठाए। प्रो. मुकुंद शरण त्रिपाठी, डॉ. टीएन मिश्र, रामकृष्ण त्रिपाठी, अभय चंद मल्ल, जय प्रकाश आर्य, राहुल राय, गिरीश सिंह, कृष्ण मोहन मालवीय आदि मौजूद रहे।