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मृतकों के परिजनों को गवाह न बनाने से आरोपियों को लाभ

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गोरखपुर।
बीआरडी मेडिकल कॉलेज में बच्चों और लोगों की मौत के मामले में पुलिस ने भले ही एफआईआर दर्ज कर ली लेकिन केस को कोर्ट में स्टैंड कराने में दिक्कत आएगी। पुलिस ने मामले में गवाह नहीं बनाए हैं। इसका लाभ आरोपियों को मिल सकता है। कानून विशेषज्ञ कहते हैं कि न्यायालय में किसी भी केस को साबित करने के लिए मौखिक साक्ष्यों की जरूरत पड़ती है। सबसे अहम चश्मदीद या फिर मृतक के परिजनों का बयान होता है। मेडिकल कॉलेज में 34 बच्चों की मौत हुई थी। परिजन चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे थे कि ऑक्सीजन की कमी थी। मामले में परिजनों को बतौर गवाह पेश किया जा सकता था। इससे केस को मजबूती मिलती और आरोपियों को गुनहगार साबित कराने में मददगार हो सकती थी।

कमजोर होगा केस
जिस समय ऑक्सीजन की सप्लाई बाधित हुई उस समय किसकी मौत हुई यह विवेचना का विषय है। मृतक के परिजनों की गवाही से केस और मजबूत हो सकता था। बिना मौखिक साक्ष्य के उस समय मेडिकल कॉलेज में क्या हुआ कौन बताएगा। थाना हजरत गंज लखनऊ में दर्ज एफआईआर में ऐसा कोई तथ्य नहीं है जिससे मृतक के परिजनों के साक्ष्य की जरूरत हो। क्योंकि ऑक्सीजन की आपूर्ति ठप होने से मृत्यु होना ही शासन सिरे से खारिज कर चुका है। ऐसे में केस कमजोर होगा।
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- एडवोकेट दिनेश चंद्र चौधरी, फौजदारी मामलों के जानकार

मौतों की नहीं है एफआईआर
ऑक्सीजन की सप्लाई ठप होने से हुई मौतों के मामले में कोई मुकदमा दर्ज नहीं हुआ है। जो मुकदमा दर्ज है उससे इन मौतों का कोई संबंध नहीं है। मेडिकल कॉलेज में जो दुर्व्यवस्था थी यह एफआईआर उसके संबंध में है। जब तक मृतकों के परिजनों से तहरीर लेकर भारतीय दंड संहिता की धारा 304 में मुकदमा दर्ज नहीं किया जाता, तब तक मौत के जिम्मेदारों को सजा दिलाने में दिक्कत आएगी। दस्तावेज सबूत होते हैं लेकिन गवाही अहम होती है।
- एडवोकेट गिरिजेश शुक्ल, फौजदारी मामलों के जानकार
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