सीडेस्क और लखनऊ के ध्यानार्थ
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ग्लैंडर्स की चपेट में आए घोड़ों को मौत की नींद सुलाया
संतकबीरनगर में हाई अलर्ट, प्रति दिन 20 सेंपल का लक्ष्य
बाराबंकी में संक्रमण मिलने पर किया था प्रदेशभर में अलर्ट
अमर उजाला ब्यूरो
संतकबीरनगर। घोड़े, गधे, खच्चर, टट्टू के लिए जानलेवा साबित होने वाले ग्लैंडर्स फार्सी का संक्रमण संतकबीरनगर तक पहुंचने से जिले के पशुपालकों और प्रशासन में हड़कंप की स्थिति पैदा हो गई है। इस रोग की पुष्टि होने पर प्रशासनिक देखरेख में दो घोड़ों को इंजेक्शन देकर मौत की नींद सुला दिया गया। हाई अलर्ट के बीच प्रति दिन 20 पशुओं के सेंपल लेकर जांच कराई जा रही है, जबकि घोड़े व इस प्रजाति के अन्य पशुपालने वाले लोगों का स्वास्थ्य परीक्षण भी कराया जा रहा है।
कुछ समय पहले बाराबंकी में एक घोड़ा ग्लैंडर्स फार्सी की चपेट में पाए जाने पर जारी हुए सतर्कता के निर्देश के तहत संतकबीरनगर से घोड़े-गधों के 20 सेंपल हिसार स्थित राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र जांच के लिए भेजे गए थे। जांच रिपोर्ट में दो घोड़ों में इस बीमारी के लक्षण मौजूद होने की पुष्टि हुई। मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. टीपी मिश्र ने बताया कि डीएम से रिपोर्ट साझा करने के बाद बरडाड़ स्थित ईंट भट्ठे पर मौजूद दोनों घोड़ों तक पहुंचा गया। इस रोग से घोड़ों को उबारने का रास्ता न होने के कारण तथा अन्य पशुओं में संक्रमण रोकने के लिए विशेषज्ञों की टीम ने दोनों घोड़ों को इंजेक्शन देकर मौत की नींद सुला दिया। संक्रमण से बचाव को ध्यान में रखते हुए नमक-चूने के मिश्रण के साथ आबादी से दूर दोनों को दस फीट से ज्यादा गहराई में दफन कर दिया गया।
पता चला है कि ईंट भट्ठों पर घुमंतू शैली में आने वाले श्रमिकों के साथ ये घोड़े बुलंदशहर और आगरा की तरफ से आए थे। एहतियातन जिले में प्रति दिन घोड़े, गधे, खच्चर के 20 सेंपल लेकर हिसार जांच के लिए भेजे जा रहे हैं। दो घोड़ों में संक्रमण की पुष्टि होने के बाद इनके संपर्क में रहने वालों की जांच और प्रतिरक्षण के लिए डीएम ने सीएमओ को मेडिकल टीम सक्रिय करने के निर्देश दिए हैं। और मार्गदर्शन के लिए दिल्ली स्थित नेशनल सेंट्रर फॉर कम्युकेबिल डिसीज से भी संपर्क किया जा रहा है।
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ग्लैंडर्स के लक्षण
- शरीर पर फोड़े या गांठ
- नाक में छाले, पीला स्राव बहन
- सांस में दिक्कत, बुखार
- खांसने जैसी धसक उठना
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विश्व युद्ध में ग्लैंडर्स को बनाया था शस्त्र
दुश्मन पर जैविक हथियार से हमले किए थे
शोभित पाण्डेय
संतकबीरनगर। लाइलाज होने के कारण ग्लैंडर्स फार्सी के नाम से भले ही पशुपालक और पशु प्रेमी थरथरा जाते हैं लेकिन पुराने दौर में युद्ध के समय दुश्मन को शिकस्त देने की कूटनीति के तहत इसके विषाणु शस्त्र की तरह इस्तेमाल होते रहे हैं।
इतिहास के जानकार बताते हैं कि पुरातन वक्त में घोड़ा न सिर्फ फौज की गतिशीलता का बड़ा यातायात साधन होता था बल्कि खास समझ के कारण युद्ध कौशल में प्रशिक्षित घोड़ों का इस्तेमाल शस्त्र की तरह भी होता था। ऐसे में फौज के घोड़ों को परेशानी में डालकर दुश्मन की टीम में खलबली मचाने की कूटनीति युद्ध का हिस्सा हुआ करती थी। मुगलकाल की कई लड़ाइयों में जहां घोड़ों में इस रोग के संक्रमण से सेना के तितर-बितर होने के उदाहरण मिलते हैं, वहीं ग्लैंडर्स पीड़ित घोड़ों को तुरंत मार देने की मिसालें भी मौजूद हैं। संतकबीरनगर के मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. टीपी मिश्र बताते हैं कि प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में भी दुश्मन की फौज की एकाग्रता भंग करने के लिए ग्लैंडर्स के विषाणुओं का हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया था।
पर्वतीय इलाकों व दुर्गम रास्तों पर आज भी लोगों की आवाजाही के लिए घोड़ा सशक्त माध्यम है तो सामान की ढुलाई में गधे-खच्चर का इस्तेमाल भी आम है। इसके चलते सेना और पुलिस में घोड़ों को इस रोग से बचाने के लिए अतिरिक्त सावधानी बरती जाती है।
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इंसान में भी हो सकता है संक्रमण
संतकबीरनगर। मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. टीपी मिश्र के मुताबिक इस रोग के संक्रमण वाले घोड़े, गधे, खच्चर के करीब रहने वाले अथवा अश्वशाला में काम करने वाले लोगों में भी ग्लैंडर्स फार्सी का संक्रमण हो सकता है। संक्रमित इंसानों में भी संक्रमित पशु के जैसे लक्षण उभरते हैं। इसी नजरिए से सीएमओ के जरिए मेडिकल टीम को सक्रिय किया जा रहा है।