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नारी अबला का प्रतीक, अब स्त्री, महिला या फिर औरत कहें

Sun, 07 Oct 2018 09:52 PM IST
अमर उजाला/गाोरख्ापुर
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पुस्तक का विमाोचन किया गया। - फोटो : amar ujala
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गोरखपुर। ‘कितना बदला है स्त्री विमर्श’ ने सबका ध्यान खींचा। पांच महिलाओं के पैनल ने नारी कहे जाने पर कड़ी आपत्ति की। कहा कि यह शब्द अबला का भाव व्यक्त करता है। स्त्री, महिला या फिर औरत कहना सम्मानजनक है। यह सशक्त होने का भाव पैदा बताता है। और यह भी कि बेटी पैदा होने पर भी सोहर गाया जाए।
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संचालक डॉ. उत्कर्ष सिन्हा के सवाल पर साहित्यकार और पत्रकार गीताश्री ने कहा कि नख-शिख का वर्णन छोड़ दें तो पुरुषों का लेखन संदेह के घेरे में है। महिलाओं की उपलब्धि को नजरअंदाज कर उन्हें दीनहीन बताया गया। महिला यदि पुरुष को गहना समझ गले में पहने और पुरुष उसे टोपी समझे यह नहीं चलेगा। अब जमाना बराबरी का है।

कवयित्री रंजना जायसवाल ने कहा कि स्त्री कभी पुरुष के खिलाफ या विरोध में नहीं रही। विरोध उस नजरिए का है जो महिला और पुरुष को अलग बनाता है। महिला की तरह ही पुरुष में भी संवेदना होनी चाहिए। महिला से सखी जैसा व्यवहार हो तो कभी टकराव नहीं होगा। अब पति परमेश्वर नहीं, परिवार का हिस्सा है। हमें स्त्री होने पर गर्व है।
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लेखिका सोनाली मिश्रा ने पुरुष लेखन में भेदभाव की तरफ इशारा किया। कहा कि महिलाओं को खुलकर लिखने की छूट नहीं मिली थी। इसी से स्त्री के सपनों को अच्छे से नहीं उभारा जा सका। उन्होंने कश्मीर को बचाने वाली महारानी कोटा का उदाहरण भी दिया। सोनाली ने सीता और द्रोपदी को अबला मानने से इंकार किया।

गीतकार, कवि और गायिका मालविका हरिओम ने कहा कि साहित्य समाज का दर्पण है। यह भी सही है लेकिन अब साहित्य को समाज की तरफ बढ़ना होगा। नई पौध के तेवर अलग हैं। उन्होंने स्त्री विमर्श के विरोध में उठने वाली आवाज की तरफ इशारा किया और कहा कि स्त्री की हालत अब भी वही है। विमर्श में मुद्दों की प्राथमिकता तय होनी चाहिए।
ब्लॉगर निकिताशा कौर ने कहा कि लड़कियों के लिए क्या अच्छा और क्या बुरा है, यह तय करने का अधिकार पुरुषों को नहीं होना चाहिए। अब लड़कियां समझदार हैं। पढ़ाई-लिखाई करके समझदारी से आगे बढ़ रही हैं।
 

आगे जाना है तो सूरज की तरह जलना होगा

गोरखपुर। छोटे शहर के चमकते सितारे। यह था चर्चा का विषय। चर्चा करने वाले भी वे ही सितारे थे जो गोरखपुर जैसी जगह से उदित हुए पर आज उनकी चमक ही बड़े शहरों में उनकी पहचान है। उन्होंने फेस्ट में जुटे युवाओं से अपनी सफलता के राज साझा किए। शब्द अलग थे पर भाव एक-आगे जाना है तो सूरज की तरह जलना होगा। कड़ी मेहनत, आत्मविश्वास, भरोसा और ज्ञान का कोई विकल्प नहीं। संचालक शुभेंदु सत्यदेव के सवाल पर राज्यसभा टीवी की एंकर अमृता चौरसिया ने कहा कि गोरखपुर से नई दिल्ली गई तो कहा गया कि कहां समुद्र में आ गईं। बड़ी मछलियां हैं निगल जाएंगी पर हार नहीं मानी। संघर्ष किया और बेहतर मुकाम हासिल किया। 24 घंटे काम करने की शर्त पर नौकरी मिली थी लेकिन आत्मविश्वास से स्वीकार किया। शिखर पर पहुंचने के लिए अच्छी सोच, दिमाग की जरूरत होती है। घर-परिवार संभालने के साथ ही नौकरी कर रही हूं। 

फिल्म निर्देशक सुशील राजपाल ने कहा कि गोरखपुर जैसे शहर से मुंबई गया। प्रतिकूल परिस्थितियों में काम के बूते आगे बढ़ा। सुशील ने युवाओं को नसीहत भी दी कि हर मां-बाप चाहते हैं कि बेटा डॉक्टर या इंजीनियर बने पर आप वही करें जो आपको अच्छा लगे। हां, बेहतर करने को पलायन जरूरी नहीं। अपने शहर में ही अच्छा किया जा सकता है।

टीवी न्यूज एंकर चित्रा त्रिपाठी ने बताया कि जब गोरखपुर के छोटे चैनल में थी तो दोस्तों के कपड़े पहनकर एंकरिंग की। अब बड़े चैनल में हूं। डिजाइनर ड्रेस तैयार करते हैं। जुनून-जिद के साथ खुद पर भरोसा था। दिल्ली में बड़े लोगों के बीच में मेहनत से जगह बनाई। चित्रा ने युवाओं को टिप्स में कहा कि सोशल मीडिया से जुड़ें। भाषा की सही जानकारी के साथ आत्मविश्वास से आगे बढ़ें। युवाओं के लिए दिल्ली के दरवाजे खुले हैं। नौकरी और पैसा भी खूब है। 

पत्रकार संजय सिंह ने कहा कि पत्रकारिता का कोई सटीक फार्मूला नहीं है। आपको आत्मविश्वास के साथ प्रदर्शन में निरंतरता बनाए रखनी होगी। सामाजिक सरोकार पत्रकारिता का मूल उद्देश्य है। इंसान अकेले नहीं बनता, उसे बनाने का काम समाज करता है। छोटे शहर से जाकर दिल्ली में मुकाम हासिल करना सपने जैसा है।
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