गोरखपुर। रामायण समाज एवं राष्ट्र के लिए उच्च आदर्श एवं प्रतिमान स्थापित करता है। मूल्यों की स्थापना ही वाल्मीकि का उद्देश्य है। राम हमारे इतिहास, साहित्य, कथा और कल्पना के आधार हैं। समाज की चुनौतियों को देखते हुए आचार्यों ने समाज के लिए नए-नए आदर्श गढ़े। रामकथा वही आदर्श है, जो नित्य प्रवाहमान है।
ये बातें गोरखपुर यूनिवर्सिटी के इतिहास विभाग, भारतीय पुराण अध्ययन संस्थान और भारतीय इतिहास संकलन समिति के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित रम्या रामायण कथा के उद्घाटन समारोह में मुख्य वक्ता फिल्मकार और चिंतक डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने संवाद भवन में कहीं। उन्होंने कहा कि रामकथा मूल्यों की स्थापना करती है। यही वाल्मिकी रामायण का उद्देश्य है।
मुख्य अतिथि रामायण दर्शन के अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ आचार्य सोहनलाल नारंग ने कहा कि यह रामायण सम्मेलन नए चिंतन को बढ़ावा देगा और समाज में राम भक्ति एवं मानवीय मूल्यों के प्रचार-प्रसार में सहायक होगा। भरत का आदर्श एवं सीता का महान चरित्र भारती की जनता को निरंतर प्रेरणा देती रहेगी।
अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के सचिव डॉ. बाल मुकुंद ने विदेशी विद्वानों की भ्रांतिपूर्ण व्याख्याओं से दूर रहने की सलाह दी। कहा कि रामायण में विकृति कर पाठ्यक्रम के माध्यम से इसे दुष्प्रचारित किया जा रहा है। हमें अपनी परंपरा के संरक्षण के प्रति सचेत रहने की जरूरत है। जेएनयू के डॉ. संतोष शुक्ल ने रामायण अध्ययन एवं सम्मेलन के समक्ष विमर्श के बिंदुओं पर प्रकाश डाला।
इतिहास की हेड प्रो. निधि चतुर्वेदी ने रामायण अध्ययन एवं अनुसंधान के लिए योजनाओं को रेखांकित किया। इससे पहले कुलपति प्रो. वीके सिंह ने अतिथियों का स्वागत किया। संचालन आईसीएचआर के सहायक निदेशक डॉ. ओम उपाध्याय ने किया। आभार ज्ञापन भारतीय इतिहास संकलन के महामंत्री प्रो. ईश्वर शरण विश्वकर्मा ने किया। राष्ट्रीय सम्मेलन में देशभर के 250 से ज्यादा विद्वान हिस्सा ले रहे हैं।
कार्यक्रम में प्रो. हिमांशु चतुर्वेदी, प्रो. दिग्विजय, प्रो. हर्ष कुमार सिन्हा, प्रो. अजय शुक्ल, पूर्व मेयर डॉ. सत्या पांडेय, रजिस्ट्रार शत्रोहन वैश्य, डॉ. अंजना सिंह, डॉ. गोविंद झा, डॉ. प्रतिभा शुक्ला, डॉ. प्रचेतस, डॉ. प्रतिमा शुक्ला, डॉ. सुदेशना भट्टाचार्य आदि मौजूद थे।
भाई सिर पर मुकुट रखे तो रामायण, छीन ले तो महाभारत
रामायण दर्शन के अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ सोहनलाल नारंग ने कहा कि राम से हंसना, रोना, उठना, बैठना, राग, अनुराग सीखने चाहिए। वह भारतीय संस्कृति के कण-कण में बसे हैं। इतिहास का संकलन बहुत हो गया, अब उसे प्रकट करना जरूरी हो गया है। रामायण और महाभारत के अंतर को समझाते हुए कहा कि भाई सिर पर मुकुट रखे तो रामायण और छीन ले तो महाभारत। दोनों ही महाकाव्यों के विषय अलग-अलग हैं, मगर दोनों ही सहजता से प्रकट होते हैं। अगर कौशल्या राम को राक्षसों से लड़ने नहीं भेजती तो वह रामायण न होकर महाभारत हो जाती।
मेडिकल कॉलेज के मृतकों को दी श्रद्धांजलि
ऑक्सीजन की कमी से काल के गाल में समाए 50 से अधिक मासूमों की मौत पर देश भर से जुटे साहित्यकारों और विद्वानों ने दो मिनट का मौन रखकर मृतकों को भावभीनी श्रद्धांजलि दी। वहीं देर शाम रम्या रामायणी सम्मेलन के अंतर्गत होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों को भी स्थगित कर दिया गया।