गोरखपुर।
पूरी दुनिया में खादी की अलख जगाने वाले बापू के खादी वस्त्र भी जीएसटी की मार से अछूते नहीं है। खादी के कपड़ों को जीएसटी के दायरे में लाने से इसके तलबगारों की संख्या में कमी दर्ज की गई है। सरकार की बेरुखी के चलते इस राष्ट्रीय धरोहर से जुड़े हजारों परिवारों पर रोजी-रोटी का खतरा मंडरा रहा है। हाथ से कताई और बुनाई होने की वजह से पहले ही इन वस्त्रों के शौकीन बड़े कम हैं। ऊपर से जीएसटी ने इसकी ब्रिकी को प्रभावित कर दिया है। जीएसटी से एक हजार रुपये से अधिक के वस्त्रों की खरीदारी पर शौकीनों को 120 रुपये और एक हजार रुपये के कम के वस्त्रों की खरीदारी पर करीब 80 रुपये तक ज्यादा खर्च करने पड़ रहे हैं।
पूर्व की सरकारों के खादी और ग्रामोद्योग पर किसी प्रकार का कोई टैक्स नहीं लगाया था। साथ ही गांधी जयंती से 108 दिनों तक खादी को बढ़ावा देने के लिए विशेष छूट दी जाती रही है। इसमें केंद्र सरकार की ओर से 15 फीसदी, राज्य सरकार 10 फीसदी और गांधी संस्थान पांच फीसदी समेत 30 फीसदी की छूट मिलती रही है। इस बार केंद्र और संस्थान की ओर से छूट तो दी जा रही है मगर राज्य सरकार की ओर से मिलने वाली 10 फीसदी छूट खादी पर नहीं दी जा रही है। इससे 20 फीसदी छूट का लाभ ही खादी के शौकीनों को मिल रहा है। वहीं रेडीमेड गांधी वस्त्रों में 1000 हजार रुपये से नीचे की खरीद पर पांच फीसदी और 1000 रुपये से ऊपर की खरीदारी पर 12 फीसदी जीएसटी वसूल किया जा रहा है। इससे जहां खादी के शौकीनों की संख्या घटी है।
जीएसटी से खादी के वस्त्र महंगे हुए हैं। शौकीनों की संख्या में कमी दर्ज की गई है। ग्रामोद्योग को बढ़ावा देने की तरफ काम हो रहा है।
- विश्वेश्वरनाथ तिवारी, सचिव, गांधी आश्रम गोलघर