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फिराक को जयंती की पू र्व संध्या पर किया याद

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गोरखपुर।
रघुपति सहाय ‘फिराक़’ को प्रगतिशील लेखक संघ ने उनकी जयंती की पूर्व संध्या पर याद किया। दो सत्रों में आयोजित कार्यक्रम के दौरान फिराक़ गोरखपुरी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर चर्चा हुई और काव्यपाठ के जरिए उन्हें नमन किया गया। प्रेस क्लब सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता रवींद्र श्रीवास्तव ‘जुगानी’ ने की। मुख्य अतिथि डॉ. अज़ीज़ अहमद रहे।
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शुरुआत ‘वर्तमान में साहित्यकार की भूमिका’ विषय पर डॉ. अज़ीज़ अहमद के संबोधन से हुक्त्रस्। उन्होंने कलम की ताकत का अहसास कराया। कहा कि साहित्यकारों की जिम्मेदारी है कि वह अपने दौर को ईमानदारी से अपनी कलम से बयां करें। कहा कि आज की जरूरत है कि हम यहां से अपना सफर फिर से शुरू करें। हमें कामयाबी जरूर मिलेगी। हालांकि, यह आसान भी नहीं है। रवींद्र श्रीवास्तव ‘जुगानी’ ने फिराक के जीवन समेत उनकी रचनाधर्मिता पर प्रकाश डाला। कहा कि एक फिराक में सात फिराक शामिल हैं। जब उनका जन्म हुआ तो महंगाई ज्यादा थी, इसलिए उन्हें महंगू नाम मिल गया। बाद में स्कूल गए तो घरवालों ने रघुपति सहाय नाम दिया। गोरखपुर में प्रेमचंद के संपर्क में आए तो एक लेख के नीचे लेखक का तकल्लुस ‘फिराक’ उन्हें भा गया। इस पर रघुपति सहाय ने प्रेमचंद से पूछा कि क्या वह इस तकल्लुस को अपने नाम के साथ जोड़ सकते हैं। इस पर प्रेमचंद ने स्वीकृति दी तो वहीं से वह ‘फिराक’ हो गए। सिविल सर्विसेज में सफलता, फिर नौकरी से इस्तीफा देकर कांग्रेस से जुड़ना और कांग्रेस को छोड़कर साहित्य सेवा में जुट जाना उनके विद्रोही तेवर का प्रमाण है। रवींद्र श्रीवास्तव ‘जुगानी’ बोले, गोरखपुर की माटी ऐसी है कि यहां जन्मने वाले विद्रोही स्वभाव के होते हैं। यहां गोरखनाथ, कबीर और फिराक पैदा होते हैं, चंदरबरदाई नहीं। कम ही लोग जानते हैं कि फिराक ने भोजपुरी में भी रचनाएं की थीं। सैय्यद आसिफ रऊफ ने भी फिराक के व्यक्ति की विशेषताएं रेखांकित कीं। मौजूदा दौर के साहित्यकारों के लिए फिराक के व्यक्तित्व से प्रेरणा लेने की जरूरत बताई। इसके बाद हिंदी, उर्दू और भोजपुरी के एक दर्जन रचनाकारों ने काव्यपाठ किया। लखनऊ से आए सरवत जमाल, एनईआर के अधिकारी बीआर विप्लवी की गजलों को लोगों ने खूब सराहा।
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