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आरक्षण के चक्रव्यूह में फंसे पंचायत चुनाव के धुरंधर

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गोंडा। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के धुरंधर आरक्षण के चक्रव्यूह में फंस गए हैं। तीन मार्च को आरक्षण की तस्वीर साफ होने के बाद मान रहे थे कि आपत्तियों में कोई बदलाव नहीं होगा।
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इसके साथ ही चुनावी जमीन तैयार करने के लिए पूरी शिद्दत से जुटे थे। आचार संहिता लागू होने से पहले खर्चों पर कोई निगरानी नहीं थी, ऐसे में लाखों खर्च कर मतदाताओं के बीच पैठ बनाने में पसीना बहा रहे थे। सोमवार को अचानक हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद सभी की सांसे अटक गईं हैं।
अब उनको अपनी सीट बचाने की उम्मीद ही नही दिख रही है। इसके साथ ही नए फैसले ने उन्हें दो राहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। अगर आरक्षण के इंतजार में क्षेत्र में संपर्क ढीला करते हैं तो मतदाताओं के खिसकने की चिंता है।
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हाईकोर्ट के आदेश ने पंचायत के दावेदारों को जमीन पर ला दिया है। उन्हें अब सीट के आरक्षण में बदलाव होने से खर्च की चिंता सता रही है। फैसले ने कई बड़ों के मनसूबों पर भी पानी फेर दिया है, कई सीटों पर अपने लोगों को लड़ाने की तैयारी कर लिए थे।
आरक्षित होने के बाद गांव के उसी वर्ग के लोगों को चुनाव लड़ाने में जुटे थे अब अनारक्षित होने पर वह दावेदार चुनावी ताल ठोंक रहा तो मुश्किल होगी। इसी तरह का माहौल गांवों में देखने को मिल रहा है। तीन मार्च से दावेदार हर व्यक्ति के घर पर दस्तक दे चुका है। चुनावी दंगल ऐसा था मानो अभी बहुत जल्द चुुनाव है।
आयोग की बंदिशें चुनाव तिथि तय होने के बाद शुरू होंगी और अभी छूट थी। इसका फायदा उठाकर लोग अपनी स्थिति मजबूत करने में कोई कोर कसर नही छोड़ रहे थे। अब पंचायतों की तस्वीर बदलने की आहट ने लोगों के कदम रोक दिए हैं। कदम थमने के साथ ही धड़कनें तेज हो गई हैं। जिले में मौजूदा समय 20 हजार से अधिक दावेदार जोर आजमाइश कर रहे थे।
अभी तक पंचायतों का आरक्षण 1995 से अब तक आरक्षित न होने वाली पंचायतों के आरक्षण से तय हुआ था। इसमें पहले वह पंचायत उस वर्ग के लिए आरक्षित हो गईं थीं जो पांच चुनावों से आरक्षित ही नहीं हुईं थी। इसकी संख्या करीब 300 के आसपास थी।
इससे वह पंचायतें आरक्षित हो गईं थी जो जिस वर्ग के लिए कभी आरक्षित ही नही हुईं। लेकिन अब वर्ष 2015 में आरक्षण के आगे से आरक्षित होंगी। इसमें पहले 2015 में आरक्षित हुईं सीटों को हटाते हुए, अवरोही क्रम में दर्ज पंचायतों को आरक्षित किया जाएगा। इससे वही गावं आरक्षित होंगी जो वर्ष 2015 में अनारक्षित थीं या किसी दूसरे वर्ग में आरक्षित थीं। आरक्षण की यह प्रक्रिया अवरोही क्रम में आबादी के हिसाब से पंचायतों की बनी सूची पर होगी।
जिले में जिन पंचायतों का गठन वर्ष 2015 में ही हो जाना चाहिए था वह नहीं हो पाया था। इसकी कार्रवाई वर्ष 2020 में ही हो पाई थी। इसमें 160 पंचायतों का गठन किया गया था। नए नियम से आरक्षण लागू होने से सभी पंचायतें आरक्षित हो गई थीं।
नई पंचायतों के गठन के बाद अनारक्षित वर्ग के दावेदार भी चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे। लेकिन सभी सीटों के आरक्षण में चले जाने से उनको मौका नही मिला था। अब वर्ष 2015 के आधार पर आरक्षण तय होने के कारण नई सीटों में कई पंचायतें आरक्षण से बच सकती हैं। इससे इन गांवों के लोगों में उम्मीद बढ़ी हैं।
पंचायतों के आरक्षण के लिए फिर से कार्रवाई करने के फैसले से अधिकारी निश्चिंत हैं। उनको एक और मौका मिल गया है। वैसे भी अधिकारियों ने हर स्थिति के आधार पर आरक्षण के लिए मंथन कर रखा है।
वर्ष 2015 के आधार पर भी आरक्षण तैयार करने में ज्यादा वक्त नही लगेगा। कारण इसका डाटा पहले से विभाग के पास था। ज्यादा मेहनत पांच चुनावों का डाटा तैयार करके आरक्षण तय करने में लगा था। इससे अधिकारियों को कोई फर्क नही पड़ा। लेकिन दावेदारों की परेशानी दिनोदिन बढ़ती जा रही है।
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