गोंडा। देश की मिट्टी में देशभक्ति और वीरता की कहानियां सदियों से रची-बसी हैं, लेकिन कुछ परिवार ऐसे होते हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी इन कहानियों को हकीकत में जीते हैं। गोंडा की मनकापुर तहसील का महेवा नानकार गांव आज फिर से चर्चा में है। यहां के शुक्ला परिवार की पांचवीं पीढ़ी के लाल, तन्मय शुक्ला, सात मार्च को गया की ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी (ओटीए) से पासिंग आउट परेड के बाद भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन प्राप्त करने जा रहे हैं। तन्मय के पिता कर्नल बिपिन कुमार शुक्ला ने कहा, यह सिर्फ पारिवारिक परंपरा नहीं, राष्ट्र सेवा की पुकार है। हमें गर्व है कि हमारे बेटे ने भी इसे स्वीकार किया।
1841 से निरंतर जल रही मशाल
शुक्ला परिवार की सेना में सेवा की यह परंपरा लगभग 185 वर्ष पुरानी है। इस ऐतिहासिक सफर की शुरुआत वर्ष 1841 में उनके पूर्वज हवलदार करता राम शुक्ला ने की थी। करता राम शुक्ला ने न केवल ब्रिटिशकाल के दौरान सेना में अपनी सेवाएं दीं, बल्कि उन्होंने 1852 के द्वितीय एंग्लो-बर्मी युद्ध और 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम जैसे ऐतिहासिक मोर्चों पर भी भाग लिया था।
- परिवार की दूसरी पीढ़ी नायक हरि नारायण शुक्ला ने भी सेना की राह चुनी। उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान स्वेज नहर की रक्षा और मेसोपोटामिया अभियान में हिस्सा लिया। परिवार के लोगों के अनुसार, हरि नारायण शुक्ला जब युद्ध से लौटे तो बच्चों को केवल युद्ध की कहानियां नहीं सुनाते थे, बल्कि यह समझाते थे कि देश की सेवा सबसे बड़ा धर्म है।
- तीसरी पीढ़ी में लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीनिवास शुक्ला ने 1962 में आईएमए देहरादून से कमीशन प्राप्त किया। उन्होंने 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्धों में हिस्सा लिया और दुश्मन क्षेत्र में 61 किलोमीटर तक अग्रसर होने का साहसिक अभियान भी किया। बाद में वे ऑपरेशन पवन के तहत श्रीलंका में भारतीय शांति सेना का हिस्सा बने। सेवानिवृत्त के बाद भी उनका मन समाज सेवा में लगा रहा। इसी भावना से उन्होंने सैनिक परमार्थ चिकित्सालय की स्थापना की, जहां आज भी जरूरतमंद ग्रामीणों का मुफ्त इलाज होता है।
- परिवार की चौथी पीढ़ी कर्नल बिपिन कुमार शुक्ला हैं, जो 1995 में सेना में कमीशन हुए। उनकी सेवा यात्रा भी कम रोमांचक नहीं रही। सियाचिन ग्लेशियर जैसे दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध क्षेत्र में तैनाती, कारगिल युद्ध (1999), ऑपरेशन पराक्रम, कश्मीर और असम में प्रति-विद्रोह अभियान में उन्होंने सक्रिय योगदान दिया। वर्तमान में वे लद्दाख में सेवा दे रहे हैं। कर्नल बिपिन का संदेश है कि सेना की वर्दी सिर्फ नौकरी नहीं, जिम्मेदारी होती है।
कॉर्पोरेट की चमक छोड़ चुनी देश सेवा
तन्मय शुक्ला ने कंप्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की है। जहां आज के युवा लाखों के कॉर्पोरेट पैकेज के पीछे भागते हैं, वहीं तन्मय ने अपने परिवार के मूलमंत्र राष्ट्र की सेवा ही हमारा कर्तव्य है, समाज की सेवा हमारा मिशन को चुनना बेहतर समझा। परिवार के लोगों के अनुसार, बचपन से ही तन्मय अपने पिता और दादा की वर्दी को देखकर प्रेरित होते थे।
गांव में जश्न का माहौल
महेवा नानकार गांव में खुशी की लहर है। यहां न केवल तन्मय के पूर्वजों का स्मारक है, बल्कि उनके दादाजी की स्मृति में स्थापित एक चिकित्सालय भी ग्रामीणों की सेवा कर रहा है। गांव के दीनानाथ शुक्ल बताते हैं कि तन्मय की उपलब्धि ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि आधुनिकता के इस दौर में भी विरासत और राष्ट्रभक्ति के संस्कार जीवित हैं।
पांच पीढ़ियों का सैन्य सफर
पहली पीढ़ी – हवलदार करता राम शुक्ला (1841–1859)
सैन्य इकाई : 32 बंगाल नेटिव इन्फैंट्री (बंगाल आर्मी)
प्रमुख अभियान : दूसरा एंग्लो-बर्मी युद्ध (1852), 1857 का विद्रोह
दूसरी पीढ़ी – नायक हरि नारायण शुक्ला (1907–1923
सैन्य इकाई : थर्ड ब्राह्मण बटालियन, बाद में एएससी बटालियन
प्रमुख अभियान : प्रथम विश्व युद्ध, स्वेज नहर की सुरक्षा, मेसोपोटामिया अभियान
तीसरी पीढ़ी – लेफ्टिनेंट कर्नल श्री निवास शुक्ला (1954–1990)
कमीशन : 1962, आईएमए देहरादून
प्रमुख अभियान : 1965 व 1971 भारत-पाक युद्ध, ऑपरेशन पवन (श्रीलंका)
चौथी पीढ़ी – कर्नल बिपिन कुमार शुक्ला (1995–वर्तमान)
कमीशन : 10 जून 1995, आईएमए देहरादून
प्रमुख अभियान : सियाचिन, कारगिल युद्ध, ऑपरेशन पराक्रम, कश्मीर व असम में अभियान
पांचवीं पीढ़ी – लेफ्टिनेंट तन्मय शुक्ला (2026)
कमीशन : 7 मार्च 2026, ओटीए गया
शिक्षा : कंप्यूटर साइंस इंजीनियरिंग, एसआरएम विश्वविद्यालय चेन्नई
बेटी ने भी बढ़ाया परिवार का मान
परिवार में उत्कृष्टता केवल सेना तक सीमित नहीं है। लेफ्टिनेंट तन्मय की जुड़वां बहन तन्वी शुक्ला ने एमिटी यूनिवर्सिटी नोएडा से एप्लाइड साइकोलॉजी में एमए कर स्वर्ण पदक हासिल किया है।