हलधरमऊ ब्लॉक के सोनहरा गांव में एक और सपूत ने जन्म लिया था। आजाद हिंद फौज में भर्ती होकर देश के आजादी में योगदान देने वाले इस सपूत के परिवार को विरासत में अशिक्षा व बेबशी मिली है।
ताम्रपत्र दिखाते हुए सेनानी के पुत्र केवल इतना ही जानते हैं कि पिताजी को सिर्फ ताम्रपत्र मिला था। बाकी शासन-प्रशासन की ओर से कुछ नहीं मिला। केवल तीन बीघा खेती में लंबा परिवार चलाने वाले सेनानी के पुत्र व उनका परिवार किसी तरह जीवन यापन कर रहा है।
हलधरमऊ के सोनहरा डीहा गांव में जन्में रामरेखा मिश्र भी राम अछयबर तिवारी के साथ अंग्रेज की सेना में भर्ती हुए थे। इन्हें भी द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान बंदी बना लिया गया था।
बाद में राम रेखा मिश्र को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की पहल पर जेल से मुक्त किया गया और आजाद हिंद फौज में भर्ती होकर राम रेखा मिश्र ने यहां अंग्रेजों के दांत खट्टे किए। 15अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ तब जाकर राम रेखा मिश्र के माता पिता को पता चला कि उनका बेटा जीवित है।
करीब आठ साल तक नेता जी के साथ अपनी पहचान छिपाकर राम रेखा मिश्र अंग्रेजों से लोहा लेते रहे। जब द्वितीय विश्व युद्ध हुआ और ये लड़ने भेज दिए गए और करीब नौ साल तक नहीं आए तो मां-बाप ने सोंचा कि उनका बेटा शहीद हो गया। लेकिन देश की आजादी के बाद वह घर लौटे और आजादी का जश्न मनाया।
राम रेखा मिश्र के पांच पुत्र थे। इनमें से चार पुत्रों की मौत हो चुकी है। एक मात्र सीता राम मिश्र ही बचे हैं। सीताराम के अनुसार करीब 25 साल तक उनके पिता को सरकार ने कुछ नहीं दिया न ही कोई पूछने आया। लेकिन 15 अगस्त 1972 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने प्रशस्ति पत्र दिया और तभी से पेंशन मिलने लगी।
वर्ष 1995 में स्वतंत्रता सेनानी रामरेखा मिश्र की मृत्यु हो गई। बताया गया उनके मृत्यु पर केवल एक इंस्पेक्टर को भेजा गया था बाकी कोई अधिकारी नहीं गया था।