गोंडा। जिला महिला अस्पताल में स्थित एसएनसीयू (सिक न्यू बॉर्न केयर यूनिट) में बेड फुल हो जाने से जरूरतमंद बच्चों को इलाज नहीं मिल पा रहा है। मजबूरी में मां को बीमार नवजात को गोद में बैठाकर इलाज कराना पड़ रहा है। बेड खाली न होने के कारण हर दिन औसतन सात से आठ नवजातों को लखनऊ रेफर किया जा रहा है। वहां पहुंचने में लगने वाले समय के कारण मजबूरी में ऐसे मासूमों को इलाज के लिए निजी अस्पतालों में भर्ती कराना पड़ रहा है।
बृहस्पतिवार को शहर की रहने वाली मुस्कान के बेटे को तकलीफ होने पर वार्ड में लाया गया। बेड उपलब्ध न होने के कारण परिजनों को गोद में लेकर नवजात का उपचार कराना पड़ा। यूनिट में तैनात स्टॉफ नर्स अखिलेश गोस्वामी ने बताया कि बेड न खाली होने के कारण नवजातों को प्राथमिक उपचार देकर लखनऊ रेफर किया जाता है। गंभीर मरीजों को भर्ती करने में प्राथमिकता दी जाती है।
इसी तरह पंतनगर के फोरविशगंज निवासी शशि को महिला अस्पताल में सिजेरियन से बेटा हुआ है। सांस लेने में परेशानी होने के कारण डॉक्टर ने नवजात को एसएनसीयू में भर्ती कराने का परामर्श दिया। वार्ड में बेड खाली न होने के कारण बच्चों को सगरा तालाब के पास स्थित एक निजी अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। बहराइच के बनियन गांव निवासी आशा देवी, वजीरगंज के चंदापुर निवासी प्रीती देवी को भी अपने बच्चे को लेकर एक निजी अस्पताल में महंगे खर्च पर इलाज के लिए ले जाना पड़ा।
जिला महिला अस्पताल में बने एसएनसीयू में 13 बेड वार्मर वाले तथा दो बेड फोटो थेरेपी के मरीजों के लिए है। एक नवजात को सामान्य तौर पर दो से तीन दिन भर्ती करना पड़ता है। स्वास्थ्य कर्मियों के अनुसार अकेले महिला अस्पताल में प्रतिदिन करीब 30 नवजातों का ऑपरेशन व सामान्य प्रसव से जन्म होता है। इनमें से औसतन आठ बच्चों को सांस लेने में तकलीफ होने अथवा पीलिया के कारण एसएनसीयू में भर्ती कराना पड़ता है। इसके साथ ही सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों से भी चार से पांच नवजात अस्पताल रेफर होते हैं। इस कारण वार्ड के बेड हमेशा फुल रहते हैं।
जिला महिला अस्पताल के सीएमएस डॉ. देवेंद्र सिंह ने बताया कि एसएनसीयू में बेड बढ़ाने की मांग सीएमओ व अपर निदेशक स्वास्थ्य से की गई है। बेड के साथ ऑक्सीजन प्लांट की क्षमता बढ़ाए जाने से नवजात शिशुओं को राहत मिलेगी।