गोंडा। एतिहासिक पसका सूकर क्षेत्र के संगम तट पर बांध बनाने से संगम के अस्तित्व पर संकट बन गया है। बांध के कारण त्रिमुहानी घाट पर सरयू व घाघरा के संगम में बाधा है। इससे संतों में नाराजगी है और वह लगातार मांग कर रहे हैं कि बांध को हटा कर संगम का अस्तित्व बहाल किया जाए।
अभी तक कोई पहल न होने पर कल्पवास के लिए आए संतो ने आंदोलन का ऐलान किया है। माना जा रहा है कि सतयुग से पसका का सूकरखेत की पौराणिकता है, और यहां का महत्व संगम से ही है। वर्तमान स्थिति से संगम हो ही नहीं रहा है तो लोगों की आस्था को ठेस पहुंच रही है।
इस मुद्दे को लेकर दूरदराज क्षेत्रों के नागा, साधु-संतों ने आरपार की लड़ाई का मन बना लिया है। संगम बहाली न होने पर कल्पवास कर रहे नागा, साधु-संत 13 जनवरी को बड़ा फैसला ले रहे हैं। बीते 11 दिनों से सरयू नदी के दक्षिणी तट पर अन्न त्यागकर बैठे मुर्तिहा बाबा (मौनी बाबा) ने आंदोलन छेड़ रखा है।
उनका कहना है कि जब तक सरयू-घाघरा का संगम नहीं होगा तब तक वह अन्न ग्रहण नहीं करेंगे। पसका मेले के दौरान संतों के आंदोलन की धार और तेज होगी। सूकरखेत, पसका धार्मिक दृष्टिकोण से एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इसके महत्व का वर्णन ग्रंथों व महाकाव्यों में किया गया है।
पुराणों में कहा गया है कि भगवान विष्णु ने वाराह का रूप धारण कर हिरण्याक्ष नामक राक्षस का वध कर पृथ्वी को पाप से मुक्त कराया था। इसी मान्यता के आधार पर इस स्थान को वाराह के नाम से जाना जाता है। भगवान वाराह का एक प्राचीन मंदिर बना है।
मंदिर में साल भर पूजा पाठ का आयोजन होता रहता है। यही नही यहां सरयू-घाघरा दोनों नदियां मिल कर धारा में परिवर्तित हो जाती है। इस स्थान को संगम के नाम से जाना जाता है। प्रतिवर्ष यहां एक भव्य मेले का आयोजन होता है। यहां सरयू नदी के किनारे श्रद्धालु एक मास तक कल्पवास कर पुण्य लाभ अर्जित करते हैं।
इस स्थान का उल्लेख स्कन्द पुराण में है। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से इसका महत्व रामचरित मानस के अमर रचनाकार के जन्मस्थान के रूप में जाना जाता है। गोस्वामी तुलसीदास ने बाल्यकाल में यहीं पर अपने गुरु नरहरिदास से रामकथा सुनी थी। इस स्थान पर मेले में लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं।
ऐतिहासिक पसका संगम के अस्तित्व पर अब प्रश्न चिन्ह लग गया है। यहां पर घाघरा नदी से निकलकर सरयू नदी में जाने वाली धारा पर 2006 में तकरीबन 16 वर्ष पूर्व बांध बना दिया गया है। जिससे आस्था पर तो चोट पहुंची ही है, इसके अलावा लोगों की भावनाएं भी आहत हुई हैं। बांध बनने के बाद अब दोनों नदियों का संगम परिवर्तित होकर चंदापुर किटौली के पास होता है।
लोगों का कहना है कि घाघरा की धारा पर यदि सायफन लटका दिया गया होता तो बाढ़ से बचाव होता, साथ ही संगम का अस्तित्व भी बरकरार रहता। इस ज्वलंत मुद्दे को लेकर दूरदराज क्षेत्रो से आये नागा, साधु-सन्यासियों में रोष व्याप्त है। 16 सालों से बांध से मुक्ति की मांग हो रही है अब यह मांग और जोर पकड़ रही है।