जुआथान पर आयोजित रामलीला के तीसरे दिन सीता स्वयंवर व परशुराम-लक्ष्मण संवाद का मंचन किया गया। सीता स्वयंवर में भगवान श्रीराम ने गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से शिव धनुष तोड़कर राजा जनक की चिंता को दूर किया।
राजा जनक के निमंत्रण पर महर्षि विश्वामित्र भगवान श्रीराम व लक्ष्मण के साथ जनकपुर पहुंचते हैं।
जनकपुर महल में स्थित फुलवारी में भगवान श्रीराम की मुलाकात माता सीता से होती है। मां सीता देवी पार्वती की पूजा-अर्चना कर उनसे पति के रुप में भगवान राम को मांगती हैं।
जनकपुर में आयोजित सीता स्वयंवर में तमाम राजा एवं राजकुमार भाग लेते हैं। राजा जनक सीता स्वयंवर की शर्त बताते हुए कहते है कि जो राजा या राजकुमार शिव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ायेेगा सीता का विवाह उसी से होगा।
शर्त के अनुसार स्वयंवर में शामिल राजा व राजकुमार शिव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास करते हैं। शिव धुनष पर प्रत्यंचा चढ़ाने की बात तो दूर कोई भी राजा या राजकुमार धनुष को उठा भी नहीं पाता है। इस पर राजा जनक चिंतित हो जाते हैं।
महर्षि विश्वामित्र भगवान राम को शिव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने की आज्ञा देते है। गुरु की आज्ञा पाकर श्रीराम धनुष को उठाकर प्रत्यंचा चढ़ाते हैं तभी धनुष टूट जाता है। धनुष टूटने की आवाज सुनकर भगवान परशुराम भी सीता स्वयंवर में पहुंच जाते है।
धनुष टूटा देखकर भगवान परशुराम क्रोधित हो उठते हैं। राजा जनक से शिव धनुष तोड़ने वाले का नाम पूछते हैं। लक्ष्मण जी क्रोधित परशुराम जी से कहते है कि शिव धनुष आपका कोई सेवक ही तोड़ा होगा।
बढ़ते हुए विवाद को देखकर भगवान राम स्वयं परशुराम जी को परिचय देते हुए अपना दिव्य स्वरुप दिखाते हैं। भगवान का दिव्य स्वरुप देखकर परशुराम जी का क्रोध शांत हो जाता है और वह प्रभु राम से क्षमा याचना करते हैं।