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92 साल पुराने रेलवे अस्पताल की स्थिति डांवाडोल

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गोंडा। अफसरों की उदासीनता से 92 साल पुराना पूर्वोत्तर रेलवे का महत्वपूर्ण अस्पताल वर्तमान में दुर्दशा का शिकार है। डाक्टरों की कमी के कारण अस्पताल का आपरेशन थियेटर (ओटी) बीते 12 साल से बंद है।
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इसमें एक भी सर्जरी नहीं की गयी जबकि गोंडा रेलवे का क्षेत्रीय कार्यालय है और यहां करीब 6 हजार से अधिक रेलकर्मी तैनात हैं। यहां तैनात अधिकांश डाक्टर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर अपना निजी अस्पताल संचालित कर रहे हैं।
अंग्रेजी हुकूमत के समय सन 1927 में रेलवे का यह अस्पताल अस्तित्व में आया था। धीरे-धीरे रेलवे का विकास होने के कारण अस्पताल पूर्वोत्तर रेलवे जोन के अंतर्गत लखनऊ डिवीजन में शामिल हो गया।
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एक दशक से अधिक समय तक इस अस्पताल का दबदबा पूर्वोत्तर रेलवे में कायम रहा। इस कारण रेलवे प्रशासन ने इसे उप मंडलीय रेलवे अस्पताल का दर्जा भी प्रदान कर सारी सुविधाओं से युक्त हर मर्ज के विशेषज्ञ डॉक्टर तैनात किए गए थे। रेलवे अस्पताल की ख्याति इतनी थी कि जिला अस्पताल से अधिक मरीज यहां बाहरी आते थे।
करीब दो दशक पहले जिला अस्पताल में इलाज से जुड़ी जो सुविधाएं नहीं थीं वह सभी इस रेलवे अस्पताल के पास थी। 1 अप्रैल 2009 को वरिष्ठ सर्जन डॉ मनोज सिन्हा के इस्तीफा दिए जाने के बाद से ही इस अस्पताल की बदहाली का दौर शुरू हो गया।
सर्जन डॉक्टर मनोज सिन्हा के अस्पताल छोड़ने के बाद से 12 साल का लंबा समय बीत जाने के बावजूद इस अस्पताल में कोई सर्जरी नहीं होने से ओटी कक्ष में ताला पड़ा है। चिकित्सकों की कमी के चलते धीरे-धीरे यह अस्पताल न होकर मात्र रिफरल सेंटर बना नजर आने लगा है। वर्तमान में रेलवे का यह अस्पताल अब केवल बीमारी व फिटनेस प्रमाण पत्र जारी करने तक ही सीमित बना नजर आता है।
70 बेड के इस रेलवे अस्पताल में सहायक मुख्य चिकित्सा अधीक्षक सहित तीन डॉक्टरों की कुल तैनाती हैै। इसमें एक फिजिशियन, एक बच्चों का डॉक्टर हैं। इसके अलावा दो चिकित्सक संविदा पर तैनात हैं। यह एक्सरे मशीन, पैथालॉजी लैब के साथ ही अनुबंध पर एंबुलेंस के संचालन की भी सुविधा है।
वर्तमान में सर्जन, महिला विशेषज्ञ, आंख व नाक कान के डॉक्टर की तैनाती नहीं है। रेलवे के किसी कर्मचारी के घायल होने पर उन्हें किसी निजी अस्पताल अथवा गोरखपुर रेलवे अस्पताल के लिए रिफर कर दिया जाता है।
सहायक मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ रमेश चंद्र का कहना है कि इस अस्पताल में कोई डॉक्टर आना ही नहीं चाहता है और जिन डाक्टरों की तैनाती है वह भी अस्पताल छोड़कर जा रहे हैं।
यह बहुत बड़ी समस्या है लेकिन इस पर रेलवे प्रशासन ध्यान नहीं दे रहा है। जो संसाधन उपलब्ध हैं उसी के सहारे मरीजों को बेहतर इलाज देने का प्रयास किया जाता है। मौजूदा समय में एक वरिष्ठ डॉक्टर के आने जाने का समय ठीक नहीं है। संबंधित को चेतावनी पत्र भी जारी किया जा चुका है।
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