नवरात्र चतुर्थी पर शनिवार को देवी मंदिरों में मां भगवती के चौथे स्वरुप कुष्मांडा देवी की आराधना की गई। प्रकृति एवं पर्यावरण की अधिष्ठात्री मां कुष्मांडा की पूजा-अर्चना के लिए देवी मंदिरों में पूरे दिन श्रद्घालुओं का तांता लगा रहा। दुर्गा पूजा पांडालों में भी मां का दर्शन करने के लिए भक्तों में भारी उत्साह रहा।
शक्तिपीठ देवीपाटन मंदिर एवं सिद्घपीठ बिजलेश्वरी देवी मंदिर में देर रात तक भक्तों की कतारें लगी रहीं। मां की आरती व जयकारों से मंदिर गूंजायमान रहे।
मां भगवती की चौथी शक्ति को देवी कुष्मांडा के रुप में जाना जाता है। नवरात्र चतुर्थी के दिन देवी के इसी स्वरुप की पूजा अर्चना की जाती है।
देवी भागवत के अनुसार ईशत हास्य से ब्रह्मांड की रचना करने वाली देवी भगवती मां कुष्मांडा के नाम से विख्यात हुई। कुष्मांडा देवी को ही सृष्टि का विस्तारक माना गया है।
प्रकृति के दोहन व लोगों को भूख-प्यास से व्याकुल देखकर माता ने शाक से धरती को पल्लवित किया और सताक्षी बनकर असुरों का संहार भी किया।
मान्यता है कि देवी कुष्मांडा को कुम्भड़े की बलि अधिक प्रिय है। जो भक्त कुम्भड़े की बलि देकर मां कुष्मांडा के स्वरुप का पूजन करते हैं, उनकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है।
नवरात्र चतुर्थी के दिन जिले के सभी देवी मंदिरों में देवी के इसी स्वरुप की पूजा-अर्चना की गई। शक्तिपीठ देवीपाटन मंदिर में भोर पहर से लेकर देर रात तक श्रद्घालुओं का जमावड़ा लगा रहा।
भक्तों ने सूर्य कुंड में स्नान करने के बाद कतारबद्घ होकर देवी की पूजा-अर्चना की और परिवारीजनों की सुख-शांति के लिए आशीर्वाद मांगा।
सिद्घपीठ बिजलेश्वरी देवी मंदिर में भक्तों ने श्रीयंत्र से पूजित मां बिजलेश्वरी देवी की पूजा-अर्चना की। इसके अतिरिक्त नगर के झारखंडी मंदिर, कालीथान, संतोषी माता मंदिर, सम्मय माता मंदिर, बड़िकी बहिनी मंदिर, भगवतीगंज स्थित दुर्गा मंदिर, तुलसीपुर स्थित नई देवी मंदिर, पचपेड़वा स्थित रहिया देवी मंदिर, महुआ स्थित करिया दुर्गा मंदिर, उतरौला स्थित ज्वाला देवी मंदिर एवं बैराही देवी आदि मंदिर में भी भक्तों ने देवी कुष्मांडा की पूजा-अर्चना करपरिवार के लिए धन-धान्य एवं सुख-शांति का आशीर्वाद मांगा।