स्वाधीनता संग्राम की लड़ाई में अवध का बहुत बड़ा योगदान रहा है। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की चिन्गारी सबसे पहले गोंडा की धरती से उठी थी, जो मशाल बनकर पूरे देश में फैल गई। इतिहास गवाह है कि जिस वक्त गोंडा के राजा देवीबख्श सिंह अपनी सेना लेकर अंग्रेजों से भिड़े थे, उस वक्त गोंडा का लमती का मैदान खून से लाल हो गया था।
राजा के 22 हजार सैनिकों ने अपना बलिदान दे दिया, लेकिन अंग्रेजों से मुंह मोड़कर नहीं भागे थे। राजा अशरफ बख्श को जिंदा उनके घर में कैद कर जला दिया गया, लेकिन इन वीर सपूतों ने पीठ नहीं दिखाई। स्वतंत्रता की पहली चिन्गारी से लेकर देश के आजाद होने तक यहां के वीर सपूतों ने अपनी कुर्बानी जारी रखी और अंतत: 15 अगस्त 1947 को देश को आजादी मिली। कुछ जाने तो कुछ अनजाने सपूतों ने भी कदम से कदम मिलाए, लेकिन उनके नाम शायद ही यहां की युवा पीढ़ी जानती हो।
10 जून 1857 तक क्रांति की लहर बहराइच, गोंडा में सकरौरा और पूरे गोंडा में फैल गई थी। सकरौरा को विंग फील्ड ने अपनी छावनी बना ली थी। 10 जून को ही सकरौरा छावनी में सिपाहियों ने विद्रोह का बिगुल फूंक दिया था। विद्रोह होते ही अंग्रेजी सेना गोरखपुर की ओर चली गई।
गोरखपुर जीतने के बाद अंग्रेजी व गोरखा सेना ने मिल कर गोंडा पर हमला कर दिया। आठ दिसंबर 1858 तक गोंडा पर अंग्रेजों ने अपना कब्जा जमा लिया। तभी गोंडा के राजा देवीबख्श सिंह अवध के नवाब के चार हजार सैनिक, 11 हजार क्रांतिकारी सैनिकों सहित कुल 22 हजार सैनिकों के साथ राजा गोंडा के चमनई नदी के तट के मैदान पर अंग्रेजों से लोहा लेने लगे।
इस लड़ाई में 22 हजार में से 21 हजार क्रांतिकारी सैनिक शहीद हो गए। 800 सैनिकों ने टिकरी के जंगल में शरण ली। दोबारा मुठभेड़ होने पर 400 सैनिक फिर शहीद हो गए।
जलियावाला कांड व रोलैट एक्ट के विरोध में गांधी जी ने खिलाफत आंदोलन शुरू किया। इस आंदोलन का गोंडा में मिर्जा मसूद अली वेग, रजीउद्दीन, मोहम्मद नसीर खां, मौलवी अहमद जमां व मास्टर घासीराम ने नेतृत्व किया। असहयोग आंदोलन में गुलाम हैदर शाह ने दरोगा व परागदास भार्गव ने नौकरी छोड़ दी और आंदोलन का नेतृत्व किया। स्वाधीनता के रणबांकुरे राजेंद्रनाथ लाहिड़ी को 17 सितंबर 1927 को गोंडा की जेल में फांसी पर लटका दिया गया।
अधिवक्ता शांती प्रसाद शुक्ल, सालिक राम, कमला प्रसाद शुक्ल, हरिहर प्रसाद वर्मा, बाबा राम खेलावन दास, वंशीधर मिश्र, वेणीधर मिश्र, उदयी सिंह, राजा राम, रोहणी प्रसाद वर्मा, राम दुलारे, राजेश्वर सिंह, राम समुझ सिंह, वंशराज सिंह, गया प्रसाद पांडेय, राजा राघवेंद्र प्रताप सिंह, रघुपति शर्मा, सरजू सिंह, अनिरुद्ध सिंग्र रघुराज सिंह, भानुप्रताप तिवारी, बाबू ईश्वर शरण, लाल विहारी टंडन, अयोध्या प्रसाद, अर्जुन प्रसाद, अवधराज सिंह, सोहरत सिंह, सकटू, हर प्रसाद, अयोध्या हलवाई, ओम प्रकाश काली प्रसाद सहित सैकड़ों क्रांतिकारियों ने देश की आजादी में अपनी आहुतियां दी हैं।
देश अब राजनेताओं की कठपुतली बन चुका है। देश में फैला भ्रष्टाचार गुलामी की जंजीरों से कहीं अधिक घातक है। अब एक बार फिर आतंकवाद, भ्रष्टाचार, बढ़ते अपराध के खिलाफ जंग करने की जरूरत है। युवा पीढ़ी ही अब इसे मिटा सकती है।
-राम अचल आचार्य, स्वतंत्रता सेनानी
देश को आजाद कराने वाले सेनानियों पर क्या बीती है और उन पर कैसे जुल्म हुए, इसे आज की पीढ़ी नहीं जान सकती। कारण आजाद देश में पैदा होने वाले आज के लोगों को ऐशोआराम मिला है। पैसे के लालच में लोग अब अपने भाई के ही दुश्मन हो गए हैं। ऐसे लोगों को फिर से एकता की राह पर चलना होगा, नहीं तो गुलामी की जंजीर तैयार है।
-गया प्रसाद पांडेय, स्वतंत्रता सेनानी
15 अगस्त व 26 जनवरी को जब देश के स्वाधीनता सेनानियों को याद किया जाता है और सम्मानित किया जाता है तब उनकी वीर गाथाएं सुनने की इच्छा होती है कि किस तरह से अंग्रेजों से इन्होंने लोहा लिया होगा। उससे हम युवाओं को सीख मिलती है।
-शिखा सिंह
वीरता सुन फड़कतीं हैं बांहें
देश को आजादी दिलाने में हमारे सेनानियों को किन हालातों में रहना पड़ा, लेकिन उनके योगदान को हम युवा कभी भूल नहीं सकते हैं। खास कर चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राम प्रसाद बिस्मिल, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी आदि को। इनकी गाथाएं तो हर युवा की जुबान पर हैं। इनकी वीरता सुनकर हम युवाओं की बांहें फड़कती हैं।
-अंबरीश कुमार
मदद को आगे आने की जरूरत
जैसा कि अखबारों में ऐसे वीर सपूतों की बातें प्रकाशित होती हैं जिन्होंने संघर्ष किया और अपना पूरा योगदान दिया, लेकिन अपने परिवार को कुछ नहीं दे सके। ऐसे सपूतों को जानने की इच्छा है और उन्हें भी मदद की जरूरत है। इसके लिए सबको आगे आने की जरूरत है।
-नेहा मिश्रा