गोंडा। जिगर मुरादाबादी को याद करना सिर्फ एक बड़े शायर को याद करना नहीं, बल्कि उस शायरी को याद करना है जिसमें मोहब्बत, दर्द, इंसानियत, रूहानियत और जिंदगी का फलसफा एक साथ दिखाई देता है। उनकी गजलों की सहज भाषा, रवानी और तरन्नुम ने उन्हें आम लोगों के बीच लोकप्रिय बनाया। नौ सितंबर को पुण्यतिथि पर गोंडा की अदबी दुनिया उन्हें उनके कलाम के जरिये याद करती है।
जिगर मुरादाबादी का असली नाम अली सिकंदर था। छह अप्रैल 1890 को मुरादाबाद में जन्मे जिगर रोजी-रोजगार के सिलसिले में गोंडा पहुंचे। यहां उनकी मुलाकात शायर असगर गोंडवी से हुई। दोनों की दोस्ती और अदबी सोहबत का असर जिगर की शायरी पर भी पड़ा। नौ सितंबर 1960 को गोंडा में उनका निधन हुआ। उनकी स्मृतियां आज भी जिगर मेमोरियल इंटर कॉलेज, जिगरगंज, जिगर मार्केट और मजार के रूप में शहर से जुड़ी हैं।
सदाबहार रचना
‘ये इश्क नहीं आसां इतना ही समझ लीजे, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।’
प्रमुख कृतियां
‘दाग-ए-जिगर’, ‘शोला-ए-तूर’, ‘आतिश-ए-गुल’, ‘कुल्लियात-ए-जिगर’ और ‘नग्मा-ए-जिगर’ शामिल हैं। ‘आतिश-ए-गुल’ के लिए उन्हें 1958 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। जिगर की शायरी की यही खूबी है कि समय बदलने के बावजूद उसके एहसास पुराने नहीं पड़ते। मोहब्बत, रिश्ते और इंसानियत की जरूरत आज भी उतनी ही है। शायद इसीलिए जिगर का यह पैगाम आज भी उनकी पूरी रचनात्मक विरासत का सबसे खूबसूरत परिचय बनकर सामने आता है- ‘मेरा पैगाम मोहब्बत है, जहां तक पहुंचे।’
मोहब्बत से इंसानियत तक पहुंची शायरी
शिक्षक व शायर सैय्यद इरफान मोईन कहते हैं कि जिगर की शायरी में इश्क के साथ इंसानियत और जिंदगी के गहरे एहसास मिलते हैं। उनकी तरन्नुम में कलाम पढ़ने की शैली ने मुशायरों को अलग रंग दिया और गोंडा की अदबी पहचान में उनका नाम हमेशा जीवित रहेगा।
बज़्म-ए-असगर व जिगर के जनरल सेक्रेटरी नजमी कमाल खान कहते हैं कि जिगर ने मोहब्बत को अपनी शायरी का पैगाम बनाया। उनके अशआर में प्रेम के साथ समाज और इंसानी रिश्तों की तस्वीर भी दिखाई देती है। उनकी सहज भाषा ही उन्हें आज तक लोगों की जुबान पर बनाए हुए है।
सभासद फहीम सिद्दीकी के मुताबिक, गोंडा जिगर के जीवन का अहम अध्याय रहा। असगर गोंडवी की सोहबत ने उनकी शायरी को नया रंग दिया। गोंडा में उनका रहना और निधन होना तथा उनके नाम से जुड़े स्थान आज भी इस रिश्ते को जीवंत रखते हैं।
दायर ए असगर व जिगर गोंडा के संयोजक शेख शम्स कहते हैं कि जिगर ने मोहब्बत को जीवनभर अपना विषय बनाया। उनकी गजलों में इश्क-ए-मजाजी के साथ इश्क-ए-हकीकी और इंसानियत का रंग भी मिलता है। गोंडा ने उन्हें सिर्फ अपनाया नहीं, बल्कि उनकी याद को अपनी सांस्कृतिक विरासत बना लिया।