करनैलगंज नगर के यतीम खाना के पास गुरुवार को आल इंडिया मुशायरा व कवि सम्मेलन का आयोजन मुहम्मद शाहिद उर्फ मस्तान बकाई द्वारा किया गया। इसकी अध्यक्षता शैयद शुएबुल अलीम बकाई व संचालन लखनऊ विश्वविद्यालय के उर्दू विभागाध्यक्ष डॉ. अब्बास रजा नैयर जलालपुरी ने किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. महताब आलम दिल्ली वाले रहे।
कार्यक्रम की शुरुआत शायर मुजीब सिद्दीकी के नात से हुई। उसके बाद मुनव्वर राना ने अपने मिसरे पेश किये-अलमारी से खत उसके पुराने निकल आए, फिर से मेरे चेहरे के ये दाने निकल आए। मां बैठ के ताकती थी जहां से मेरा रास्ता, जब खोद के देखा तो खजाने निकल आए।
पद्म श्री बेकल उत्साही ने पेश किया-गोरी पनघट से चली भरे गगरिया नीर, गजल भजन सब त्याग दें गालिब और कबीर। जरार अकबराबादी ने पेश किया-जब तक गरज रहेगी गुलेतर कहेंगे लोग, मै जानता हूं फिर मुझे पत्थर कहेंगे लोग।
डॉ. महताब आलम ने पढ़ा-दिल भी तोड़ा तो सलीके से न तोड़ा तुमने, बे वफाई के भी आदाब हुआ करते हैं। डॉ. नायाब हल्लौरी ने पढ़ा-गांव पूछेगा कि तुम शहर से क्या लाये हो, मेरे अल्लाह सलामत मेरे छाले रखना।
शिवकिशोर तिवारी खंजन ने पढ़ा- दीपक जले जो मंदिर में मस्जिद प्रकाश पाये, खेलन अली के घर में हरिओम रोज आये। निरपेक्ष धर्म की बातें लगेंगी अच्छी, हर ईद में मुसलमां होली के गीत गाये।
अंजार सीतापुरी ने पढ़ा- इससे पहले की दिलों में नफरत जागे, आओ एक शाम मुहब्बत से बिता ली जाये। तनवीर नगरौरी ने पढ़ा-इतनी भी उजालों से अदावत नही अच्छी, तनवीर हूं, तनवीर को तनवीर तो कहिए।
श्यामा सिंह शबा ने पढ़ा-आइने के सामने आ देख अपनी खामियां, गैर के किरदार पर उंगली उठाना छोड़ दे। महताब हैदर सफीपुरी, फैजखुमार, शहाब बलरामपुरी, नीरज पंाडेय, विकास बौखल, हैदर अलवी, सैफबाबर, नासिर जौनपुरी, रइसुश्शाकरी, उसमान मीनाई, डा. हिमायत जायसी, याकूब अज्म एवं डा. रिजवान सहित अन्य शायरों व कवियों ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत की।