एक तरफ जहां वाटर रिचार्ज के लिए केंद्र व प्रदेश सरकारें करोड़ों रुपये खर्च कर तालाब खुदवा रही हैं वहीं दूसरी तरफ प्राचीन तालाबों को कूड़े कचरे से पाटकर अवैध कब्जा करने की होड़ मची है। प्रशासन के लोग तालाबों के अस्तित्व पर मंडरा रहे खतरे के प्रति मूकदर्शक बने हुए हैं।
तालाबों के संरक्षण व संवर्द्धन की कवायद महज कागजों में ही सीमित है। जिसके चलते नगर में तालाबों का नामोनिशान मिटा जा रहा है। रविवार को ‘अमर उजाला टीम’ ने बलरामपुर नगर के प्राचीन तालाबों का जायजा लिया तो स्थिति कुछ इस तरह से दिखी। पेश है रिपोर्ट-
नगर के मोहल्ला चिकनी में रेलवे लाइन के पास स्थित तालाब की हालत महज दो साल में कमोवेश मैदान जैसी हो गई है। तालाब के आसपास रहने वाले लोगों ने तालाब को पाटकर अवैध कब्जा करना शुरू कर दिया है।
इसी तालाब में नगर पालिका परिषद के सफाई कर्मी कूड़ा भी डाल देते हैं। तालाब के जीर्णोद्धार आदि की सुध किसी को नहीं है। इसी तरह नई बस्ती स्थित तालाब, मेवालाल तालाब, रानी तालाब, पुरैनिया तालाब, पजौवा तालाब आदि पर भी लोग बेतहाशा अवैध भवन निर्माण कर कब्जा रहे हैं। यही नहीं नगर के पास ही बहने वाले पहाड़ी सुआंव नाले को पाटकर धड़ल्ले से प्लाटिंग की जा रही है।
तालाबों पर हो रहे अवैध कब्जों तथा अतिक्रमण की शिकायतें संबंधित अफसरों के दफ्तर में धूल फांक रही हैं। तालाबों के जीर्णोद्धार का कोई प्रयास जिला प्रशासन तथा नगरीय प्रशासन द्वारा नहीं किया जा रहा है। घरों से निकलने वाला गंदा पानी भी इन्हीं तालाबों में गिर रहा है, जिसके कारण इन तालाबों का जलीय जीवन भी लगभग समाप्त हो गया है।
तालाबों की दुर्दशा के चलते नगर क्षेत्र में वाटर रिचार्ज की हालत भी बदतर हो रही है। नगरवासी महिपाल गुप्त, माहेश्वरी गुप्ता, हरेंद्र सिंह, पुत्तन, शिवकुमार, एके शुक्ल आदि ने समाप्त हो रहे तालाबों का अस्तित्व बचाने की मांग डीएम से की है।