सिरिया नदी के पवित्र तट पर स्थित देवीपाटन शक्तिपीठ अपने आप में कई प्राचीन मान्यताओं की साक्षी है। यहीं पर भगवान परशुराम ने धनुषधारी व दानवीर कर्ण को शिक्षा दी थी। त्रेता युग में माता सीता ने पाताल गमन यहीं पर किया था। इस शक्तिपीठ की स्थापना नाथ संप्रदाय के आदि गुरु गोरक्षनाथ ने भगवान भोलेनाथ के आदेश पर की थी। मंदिर का पाताल चबूतरा, अखंड ज्योति, यंत्र सहित नवदुर्गा प्रतिमा, अखंड धूना व सूर्य कुंड आदि प्रमुख स्थल भी अपने आप में अनेक प्राचीन मान्यताएं व महत्व को संजोए हुए हैं।
देवीपाटन का एक नाम पातालेश्वरी भी है। ऐसी मान्यता है कि त्रेता युग में भगवान श्रीराम ने जन अपवाद के भय से माता सीता को अपनी पवित्रता सिद्ध करने के लिए कहा तो देवी सीता ने इसे अपना अपमान माना।
उन्होंने लज्जा से धरती माता से प्रार्थना की कि यदि वह सही मायने में पतिव्रता हैं तो अपनी गोद में उन्हें समा लें। सीता माता की प्रार्थना से पृथ्वी फट गई व सिंहासन पर बैठी धरती माता ने सीता जी को गोद में बैठाया और वापस पाताल में समा गईं।
लोगों का मानना है कि इसी स्थान पर सीता जी का पाताल गमन हुआ था इसीलिए इसे पातालेश्वरी के नाम से भी जाना जाता है।
भगवान विष्णु के 10 अवतारों में से छठा अवतार भगवान परशुराम माना गया है। ऐसी मान्यता है कि भगवान परशुराम ने द्वापर युग में महारथी कर्ण को इसी स्थान पर धनुर्विद्या का ज्ञान दिया था।
कर्ण ने योग साधना करके भगवान परशुराम से दिव्य अस्त्रों की शिक्षा ली थी। ये भी कहा जाता है कि यहीं पर स्थित सूर्य कुंड में स्नान करके महादानी कर्ण प्रतिदिन भगवान सूर्य की उपासना करते थे।
सतयुग में माता सती का वाम स्कंध सहित पाटंबर गिरने, त्रेता युग में माता सीता के यहां पाताल में समाने और द्वापर युग में महारथी कर्ण का यहां धनुर्विद्या ग्रहण करने जैसी मान्यताआें से जुड़े इस प्राचीन स्थल पर सर्वप्रथम मंदिर निर्माण का जो उल्लेख मिलता है वह महायोगी गुरु गोरक्षनाथ से संबंधित है।
देवीपाटन में उपलब्ध एक शिलालेख के अनुसार गुरु गोरक्षनाथ ने महादेव की आज्ञा से जहां देवी सती का पाटंबर सहित वाम स्कंध गिरा था वहां एक मढ़ी का निर्माण कराया। बाद में मंदिर का जीर्णोद्घार महाराजा विक्रमादित्य द्वारा कराया गया।
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