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सांप्रदायिक सौहार्द्र के प्रतीक हैं भगवान झूलेलाल

Mon, 17 Aug 2015 11:18 PM IST
गोंडा/अमर उजाला ब्यूरो
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वरुणावतार भगवान झूलेलालजी का चालीहा महोत्सव धूमधाम से मनाया जा रहा है। 14 अगस्त से शुरू हुए कार्यक्रम 23 अगस्त को समारोहपूर्वक संपन्न होंगे। झूलेलाल जी धर्म परायणता व सांप्रदायिक सौहार्र्द के प्रतीक हैं। इस महोत्सव को चेटीचंड भी कहा जाता है जो सिंधी समाज का सबसे बड़ा त्योहार है। इस समारोह को अलग-अलग शहरों में अलग-अलग तिथियों में मनाया जाता है।
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वरुणावतार झूलेलाल जी का चालीहा महोत्सव सावन माह में मनाया जाता है। मान्यता है कि धर्म की रक्षा के लिए ईश्वरीय सत्ता के अवतरण की उपासना सिंधु नदी के तट पर हिंदुओं ने की थी। करीब एक हजार वर्ष पहले जब हिंदुओं का धर्मांतरण करवाया जा रहा था।

सिंधु-हिंदु वासियों ने चालीस दिनों तक तपस्या की थी। वरुणावतार झूलेलाल जी का जन्म सिंध प्रांत में रतनराय जी के घर विक्रम संवत 1007 चैत्र मास के शुक्ल पक्ष दिन शुक्रवार को हुआ। उनका नाम उदय चंद रखा गया। आगे चलकर उन्हें जिंदहपीर, लालसाई, झूलेलाल, अमरलाल, उड़ेरोलाल आदि नामों से पुकारा गया।
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उस समय मिरखशाह नामक शासक ने झूलेलाल जी को मरवाने की कोशिश की। लेकिन दैवीय व अलौकिक छवि देख मिरखशाह व उसके मंत्री पीछे हट गए। बाद में झूलेलाल जी ने मिरखशाह शासक को उपदेश दिया कि हिंदू व मुस्लिम में कोई भेद नहीं है।

हर व्यक्ति को धर्म परायणता का पालन करना चाहिए। व्यक्ति को कर्तव्यनिष्ठ होना चाहिए। जिस तरह इस्लाम धर्म प्यारा है। उसी तरह हर धर्म उसके अनुयायियों के लिए महत्व रखता है। राम रहीम, गीता कुरान एक है। इस पर मिरखशाह भगवान झूलेलाल जी का अनुयायी बन गया। संवत 1020 को झूलेलाल जी अंतरध्यान हो गए।

चालीहा महोत्सव की शुरुआत कलश स्थापना से होती है। भक्तजन लगातार चालीस दिनों तक वरुणदेव की आराधना करते हैं। नित्य झूलेलाल जी का अष्टम पाठ होता है। 40 दिनों तक भक्तरस में लोग सराबोर रहते हैं।

पूरे भारत में झूलेलाल जयंती चेटीचंड का महोत्सव चैत्र मास शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से मनाई जाती है। चालीहा महोत्सव अगस्त माह में होता है। कानपुर में 15 अगस्त को, फैजाबाद में 21 अगस्त को, गोंडा में 23 अगस्त को, गोरखपुर में 25 अगस्त को, बस्ती में 27 अगस्त को तथा अकबरपुर में 29 अगस्त को महोत्सव मनाया जाता है। यह महोत्सव नौ दिनों का होता है। गोंडा में महोत्सव की शुरुआत 14 अगस्त से होगी। 23 अगस्त को मुख्य कार्यक्रम होगा।

सिंधी समाज द्वारा वर्ष 1962 से चालीहा महोत्सव मनाने की परंपरा शुरू हुई। सिंधी सेवा मंडल के नाम से एक समिति का गठन हुआ था। उस समय स्व. चेतनदास, शिवाजी, लालचंद्र, गोवर्धन सिंधी, माधवदास, देनामल, तोलामल व हासामल, मोतीचंद्र, तुलसीदास, प्रताप सिंधी ने महोत्सव की शुरुआत की थी। उक्त लोगों में तुलसीदास राय चंदानी व प्रताप सिंधी जीवित हैं। दोनों लोगों का कहना है कि यह महोत्सव उनके समाज का सबसे बड़ा त्योहार है।

पहले केवल नाटक, संगीत के साथ झूलेलाल जी का चालीहा महोत्सव मनाया जाता था। अब सेवाधर्म जैसे कार्य किए जाते हैं। रक्तदान, बच्चों के बीच प्रतियोगिताएं, शिक्षाप्रद झांकियां, मेधावी बच्चों का सम्मान किया जाता है। प्याऊ लगवाना, धर्मशाला का निर्माण, बाढ़ क्षेत्र की निर्धन कन्याओं का विवाह आदि सेवा कार्य किए जाते हैं। आध्यात्मिक कार्यक्रम नौ दिनो तक चलते है। पहले तीन दिनो का महोत्सव होता था।

अपने आराध्य की पूजा करने के साथ सेवाकार्य को समाज ने प्रमुखता दी है। इससे समाज में लोगों का मनोबल बढ़ा है। इसके लिए पूरा समाज एकजुट रहता है। यह पर्व उनके समाज के लिए सबसे बड़ा त्योहार है। -नरेश लधानी, मीडिया प्रभारी चालीहा महोत्सव, मेला कमेटी
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