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Gonda News: राष्ट्रकथा के बहाने बृजभूषण का संदेश ‘मैं लौटूंगा’

Thu, 08 Jan 2026 11:46 PM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, गोंडा
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नवाबगंज में जन्मदिन पर काफिले के साथ नंदिनीनगर जाते पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह। स्रोत: सोशल म
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गोंडा। नंदिनी नगर महाविद्यालय में आयोजित राष्ट्रकथा को सिर्फ धार्मिक आयोजन समझना अधूरा आकलन होगा। मंच, मेहमानों की फेहरिस्त और समय, तीनों इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि यह आयोजन आने वाले सियासी संघर्षों का रिहर्सल भी रहा। छह बार सांसद रहे बृजभूषण शरण सिंह ने बिना किसी औपचारिक घोषणा के यह जता दिया कि वह राजनीति के केंद्र में फिर से खुद को स्थापित करने की तैयारी में हैं।
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कार्यक्रम में जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा से लेकर प्रदेश सरकार के प्रभावशाली मंत्री सूर्य प्रताप शाही, दिनेश प्रताप सिंह, एके शर्मा तक की मौजूदगी रही। इसके अलावा जौनपुर के पूर्व सांसद धनंजय सिंह, पूर्व एमएलसी बृजेश सिंह, सांसद जगदंबिका पाल और महिला आयोग की उपाध्यक्ष अपर्णा यादव का मंच साझा करना यह संदेश दे गया कि बृजभूषण का दायरा अब देवीपाटन तक सीमित नहीं रहा।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह वही बृजभूषण हैं जो 2024 के लोकसभा चुनाव से बाहर रहे, लेकिन संगठन और सत्ता के भीतर उनकी स्वीकार्यता रही। राष्ट्रकथा के मंच से सियासी भाषण नहीं हुआ, लेकिन हर मौजूदगी अपने आप में बयान बनती रही। कार्यक्रम के दौरान बृजभूषण का भावुक होना भी सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बना। दबदबे और संघर्ष की बात करते समय उनकी आंखों से आंसू बहना कई अर्थों को परिभाषित कर रहा है। कुछ इसे आत्ममंथन मान रहे हैं, तो कुछ इसे सहानुभूति और समर्थन जुटाने की रणनीति।
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बीते दिनों एक टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में बृजभूषण ने 2029 को लेकर जो बात कही थी, उसकी गूंज राष्ट्रकथा के मंच पर साफ सुनाई दी। ''''2029 में चुनाव लड़ूंगा'''' के बयान के बाद यह आयोजन उनके सियासी इरादों की पुष्टि जैसा माना जा रहा है।
पिता-पुत्र की जोड़ी भी इस सियासी कहानी का अहम हिस्सा बनती दिख रही है। सांसद करण भूषण सिंह पहले ही यह संकेत दे चुके हैं कि 2029 में दोनों एक साथ चुनाव मैदान में होंगे। ऐसे में राष्ट्रकथा को पिता की वापसी और पुत्र की भूमिका के विस्तार के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि मंच पर संतों, महंतों और 52 समाजों के प्रतिनिधियों को जिस तरह से एक साथ साधा गया, उसे केवल सामाजिक समरसता का प्रयास नहीं माना जा रहा। राजनीतिक जानकार इसे संभावित चुनावी रणनीति की बुनियाद बता रहे हैं, जहां जाति से आगे बढ़कर ‘समूह समर्थन’ की तस्वीर खींची गई।
कथा के बाद देवीपाटन मंडल के साथ-साथ अयोध्या की चर्चा भी अब तेज हो रही है। राम मंदिर आंदोलन से जुड़ाव, संत-महंतों से रिश्ते और छात्र राजनीति की शुरुआत, इन सबको जोड़कर देखें तो यह महज संयोग नहीं लगता। हालांकि बृजभूषण खुद सीट के सवाल को टालते रहे हैं, लेकिन सियासत में खामोशी भी कई बार घोषणा से बड़ी होती है। सवाल बस इतना है कि उनकी यह वापसी किस सीट से होगी और किस सियासी मंच पर। इसका जवाब फिलहाल पर्दे के पीछे ही तैयार हो रहा है।
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