बाद के दिनों में मंदिर परिसर में अतिक्रमण कर लिया गया। जिला प्रशासन ने बुधवार को अभियान चलाकर पूरे परिसर को अतिक्रमण मुक्त कराया। इसके बाद बृहस्पतिवार को वहां चहल-पहल रही। मंदिर का मुख्य द्वार भी खोला गया। पूजन के बाद भक्तों को प्रसाद वितरित किया गया।
श्रद्धालुओं ने उड़ते हनुमानजी की प्रतिमा, कामधेनु समाधि स्थल के दर्शन व पूजन किए। शाम को बाटी-चोखा का सामूहिक भोज हुआ। मुख्य पुजारी ने जिलाधिकारी को पत्र लिखकर चारदीवारी बनवाने में मदद करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि मंदिर को अयोध्या धाम से जोड़कर ऐतिहासिक धरोहर के रूप में संरक्षित किया जाए।
संजीवन संग रुके थे हनुमान
गोंडा। बड़ी संगत मंदिर कई मान्यताओं को समेटे हुए है। पौराणिक कथाओं के अनुसार मंदिर में स्वयं बजरंगबली संजीवनी बूटी के साथ रुके थे। संजीवनी के प्रभाव से कामधेनु के दूध में अमरत्व आया था। तभी से यहां हनुमानजी की पूजा-अर्चना शुरू हो गई थी। समय बदला तो धीरे-धीरे मंदिर का विकास हुआ।
मंदिर के पुजारी रामजी दास के अनुसार मंदिर में एक कामधेनु गाय थी। धीरे-धीरे कामधेनु के दूध से अमरत्व खत्म हो गया। तभी आकाशवाणी हुई कि हनुमान इसी रास्ते से संजीवनी लेकर जाएंगे यदि वह यहां रुक जाएं तो कामधेनु के दूध में फिर से अमरत्व आ जाएगा। हुआ भी ऐसा। लंका में युद्ध के दौरान जब लक्ष्मणजी को शक्तिबाण लगा था तो हनुमानजी को संजीवनी लाने की जिम्मेदारी मिली।
हनुमानजी जब हिमालय पर्वत से संजीवनी बूटी लेकर लंका जा रहे थे तो कामधेनु की पुकार और प्रार्थना पर वह यहां आए। कामधेनु के दूध का संजीवनी पर छिड़काव किया और कामधेनु का दूध फिर से बीमारियों को खत्म करने में कारगर हो गया।