करीब सवा सौ साल पहले अंग्रेजी हुकूमत की प्रताड़ना ने एक भारतीय परिवार को हालैंड पहुंचा दिया। वह परिवार आज अपनों की खोज में करनैलगंज पहुंचा मगर आधुनिकता की चकाचौंध में वह अपने परिवार को भी नहीं तलाश कर पाया और बैंरग उसे वापस होना पड़ा।
बात वर्ष 1895 की है। जब करनैलगंज क्षेत्र के एक परिवार को अंग्रेजों ने बंधुवा मजदूरी कराने के लिए हालैंड भेज दिया। जहां से पांच वर्ष बाद उन्हें मुक्त तो किया गया मगर उन्हें सात समन्दर पार भारत वापस नहीं भेजा गया।
बुधवार को उसी परिवार के वंशी, उनकी पत्नी मोहम्मदा तथा उनका पुत्र इस्माइल वंशी करनैलगंज कोतवाली पहुंचे और अपनी दास्तान कोतवाल को सुनाई। वंशी ने बताया कि 30 जनवरी 1895 को करनैलगंज क्षेत्र से उनके परिवार को अंग्रेजों ने बंधुवा मजदूरी कराने के लिए हालैंड भेज दिया था।
उनके पूर्वज 27 अप्रैल 1895 को हालैंड पहुंचे। पांच साल बाद सन 1900 में उन्हें बंधुवा मजदूरी से मुक्त किया गया। उसके बाद उनका परिवार भारत आने के लिए प्रयास करता रहा मगर उसे नहीं आने दिया गया।
फिर वह वहीं अलमोरा शहर में बस गये। अपने वतन की मिट्टी को सिर माथे लगाने की एक लगन उनके जेहन में चल रही थी। वंशी का कहना है कि उनकी नानी रसूलन की शादी सूरीनाम में लखनऊ निवासी अली हुसैन सें हुई थी।
उन लोगों ने बताया कि उनके पूर्वजों का निवास गोंडा के करनैलगंज गांव में था। बुधवार को यह परिवार कोतवाली में पहुंचा तथा अपनी दास्तान सुनाई। कोतवाल हरी सिंह ने आसपास के बड़े बुजुर्गों एवं सम्मानित लोगों को बुलाकर उनसे मिलाया मगर कोई पता नहीं चल सका।
वंशी को हिन्दी भाषा में बोलना आता है। उनकी पत्नी हल्का हिन्दी का प्रयोग करके बात करती हैं मगर उनके बेटे को हिन्दी नहीं आती है। पूर्वजों की तलाश न हो पाने से निराश परिवार बैंरग लखनऊ वापस हो गया। कोतवाल ने बताया कि उनके पैतृक गांव व पूर्वजों की खोज का काफी प्रयास किया गया मगर सफलता न मिलने उन्हें सलामत वापस भेज दिया गया।