इस खेती के अपने आप में वैसे तो कई फायदे हैं। लेकिन सबसे ज्यादा फायदा उस मिट्टी का है, जो अंधाधुंध केमिकल के प्रयोग से दिनों दिन निर्जीव होती जा रही है।
गुरुवार को मुंडेरवा गांव में आयोजित किसान गोष्ठी में यह बात कृषि विज्ञान केंद्र गोपालग्राम के वैज्ञानिक डॉ. हरिपाल सिंह ने कहीं। उन्होंने किसानों को जैविक खेती और उससे होने वाले फायदों के बारे में बताते हुए कहा कि इस खेती का कोई भी साइड इफेक्ट नहीं है।
खर-पतवार के तौर पर गेहूं की फसल में पाए जाने वाले गेहूं के मामा संबंधी निखिल मिश्र के सवाल पर वैज्ञानिक हरिपाल सिंह ने बताया कि गेंहू के मामा को तीन प्रकार का तरीका अपनाकर रोका जा सकता है।
जिसके लिए सबसे पहले किसानों को अपने-अपने खेतों की मेड़बंदी करनी होगी। जिससे कि किसानों के खेत में जमा होने वाला पानी न तो बाहर जाए, न ही किसी के खेत का पानी उनके खेतों में आए।
साथ ही खेत जोतवाते समय इस बात का ख्याल जरूर रखना चाहिए कि जो मिट्टी वह खोद रहे हैं, उसकी गहराई कितनी है। इसके अलावा कभी भी एक खेत में एक ही फसल को बार-बार नहीं बोना चाहिए।
गेहूं की फसल में गेहूं के मामा ज्यादा होते हैं। इसलिए जब अगली बार उसमें कोई फसल बोनी हो तो उसमें दलहनी फसल बोएं। क्योंकि बार-बार एक ही खेत में एक ही तरह की फसल बोने से भी खर-पतवार जैसी बीमारियां फसलों में हो जाती हैं।
ध्यान रहे कि जैविक खेती में केमिकल युक्त रसायनों का प्रयोग बिल्कुल नहीं होता। जिससे न तो फसल प्रभावित होती है न ही उसे खाने वाले लोग। इस मौके पर किसान राजेन्द्र मिश्र, मनोज पाण्डेय, अनिल पाण्डेय व बृजेश के पूंछे गए सवाल का डॉ. एसके त्रिपाठी, मिथलेश झा ने जवाब दिया।