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झोपड़ियों में जिंदगी गुजार रहे 700 परिवार

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25जीडीएपी21-गोंडा के करनैलगंज में एलिग्न -चरसड़ी बांध पर शरण लिए लोग - फोटो : GONDA
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करनैलगंज (गोंडा)। दस साल पहले सैकड़ों परिवार अच्छे खासे जमींदार थे। उनके पास नदी के कछार के किनारे उपजाऊ जमीन थी और गन्ना, धान सहित तमाम फसलें उगा करती थीं। वर्ष 2010 में गोंडा-बाराबंकी सीमा के मध्य स्थित घाघरा में आई बाढ़ ने इन किसानों के न सिर्फ खेत व फसल तबाह किए बल्कि जमीन का 80 प्रतिशत हिस्सा नदी में समाहित हो गया। जो नदी दस साल पहले बाराबंकी में बहती थी अब वह तीन किलोमीटर उत्तर यानि गोंडा की तरफ बहने लगी। नदी की धारा बदलती गई और किसान जमींदार से याचक बनते गए। इन किसानों को बचाने के लिए वर्ष 2006-07 में करीब 54 किलोमीटर एल्गिन-चरसड़ी बांध तो बनाया गया लेकिन यह बांध केवल दिखावे का ही रहा और 2010 में यह कट गया। इसके बाद बांध कभी मजबूत नहीं हो सका और हर साल यह कटता रहा। इसमें गोंडा व नदी के इस बार बसे बाराबंकी जिले के कई गांव तबाह होते रहे। आज करीब 700 परिवार ऐसे हैं जिनके पास न तो खेत है, न फसल और न ही मकान है। बांध पर इनकी जिंदगी रफ्तार भर रही है। पेश है बाढ़ से तबाह ऐसे परिवार की स्थिति पर रिपोर्ट-
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तत्कालीन डीएम बाराबंकी ने किए थे सार्थक प्रयास
वैसे तो राजस्वग्राम नैपुरा व परसावल के बाढ़ पीड़ितों का दर्द काफी पुराना है। वर्ष 2009 में जब एल्गिन-चरसड़ी बांध कटा तो यहां के करीब 1100 परिवार बेघर हो गए। जिनमें से कुछ तो नदी के बीच टापू में बस गए और कुछ बांध पर आ गए। यहां के जिला पंचायत सदस्य राम कैलाश यादव ने कहते हैं कि इन्हे पुन: बसाने के लिए तत्कालीन जिलाधिकारी बाराबंकी विकास गोठलवाल ने काफी प्रयास किए। उन्होंने इन परिवारों को बसाने के लिए कमियार में पड़ी सरकारी जमीन पर आवास बना कर दिए जाने का प्रस्ताव शासन को भेजा था। उनके स्थानांतरण के बाद से यह मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
तत्कालीन डीएम योगेश्वर नाथ मिश्र ने भी किया था प्रयास
वर्ष 2013 से वर्ष 2015 के दौरान जिलाधिकारी योगेश्वर नाथ मिश्रा ने भी ने भी इन्हें बसाने के लिए काफी प्रयास किया और कमियार की 15 हेक्टयर जमीन जो कि पशुपालन विभाग के जिम्मे थी, का प्रस्ताव कराकर राजस्व परिषद को भेज दिया। इसके बाद से इन विस्थापित परिवारों के पुनर्वास का मामला फिर दब गया। टापू में बसे करीब 350 परिवार अक्सर बाढ़ में परेशान रहते हैं। बाढ़ आने के बाद इनका संपर्क कट जाता है ये परिवार अक्सर गंभीर बीमारियों से जूझा करते है। यहां मच्छरों की भरमार रहती है। इनकी हाल खबर लेने वाला कोई नहीं है। बांध पर व टापू में बसे लोगों के सामने सबसे बड़ी समस्या अब रोजी रोटी से लेकर उनके रहने तक की है। खानाबदोश का जीवन यापन कर रहे इन परिवारों को अब किसी ऐसे तारणहार का इंतजार है जो फिर से उनकी जिन्दगी को आबाद कर सके।
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क्या कहते हैं लोग
सदस्य जिला पंचायत राम कैलाश कहते हैं कि बांध पर रह रहे लोगों ने बताया कि सरकार की ओर से आवास तो आवंटित हुए। हर वर्ष बजट भी आता है। मगर जमीन न होने की दशा में वापस हो जाता है। गांव वालों का कहना है कि अगर जिलों की बंदिश से हमको आजाद कर आस पास के गांवों में आवास बनाने की इजाजत मिल जाये तो हमारे घर भी आबाद हो सकते हैं। मुन्ना निवासी परसावल बताते हैं कि अगर हम लोगों को कमियार की सरकारी पशुपालन विभाग की जमीन पर आवास दे कर अस्थाई रूप से बसा दिया जाय तो प्रति वर्ष बाढ़ के नाम पर खर्च होने वाले धन की बचत होगी। मुन्नी देवी निवासी परसावल हैं कि वर्ष 2014 में तत्कालीन प्रमुख सचिव सुरेश चन्द्रा ने डीएम बाराबंकी को निर्देशित किया था कि इन सभी 1100 परिवारों को कमियार में पड़ी पशुपालन विभाग की जमीन पर आवास बनाकर बसा दिया जाय। जिस पर एसडीएम रामसनेही घाट ने शासन को प्रस्ताव भी भेजा जो आज तक लंबित है। चेतराम निवासी परसावल कहते हैं कि लोग फूस की झोपड़ियां डाल कर रह रहे हैं। सबको आवास भी मिला है, लेकिन इस जमीन पर आवास बनाने की इजाजत नहीं है क्योंकि जमीन पशुपालन विभाग की है। मंगल कहते हैं कि अधिकारी अपनी अपनी थ्योरी बता कर चले जाते हैं। हमारी समस्या के लिए सरकार एक कमेटी का गठन करे जो उचित निर्णय ले कर हमको कहीं भी बसा दें। राजकुमार यादव कहते हैं कि परसावल व नैपुरा में पुराने रिकॉर्ड के अनुसार 18 मजरे हैं। जिसमें से आधा दर्जन की विद्युत सप्लाई चालू है। शेष के खंभे सुरक्षित नहीं है। राजस्व ग्राम नैपुरा में 3 वर्षों से बिजली नहीं है।
गरमी की सब्जियों से बरसात में चलती हैं जिंदगी
बांध पर बसे चेतराम ने बताया कि जब गरमी में नदी उतार पर रहती है और घाघरा के मध्य जो जमीन पानी से खाली रहती है उसमें परवल, खरबूजा, तरबूज, तरोई व लौकी सहित कुछ सब्जी व फल उगाए जाते हैं। लेकिन जैसे ही बाढ़ आती है सब कुछ बह जाता है। मुन्नी देवी ने बताया कि जो सब्जियां उगाई जाती हैं उसी को बेंचकर बच्चों का पालन पोषण किया जाता है। जितने दिन बाढ़ रहती है उतने दिन तक केवल मजदूरी ही सहारा होता है।
बारिश में बंद रहता है स्कूल
करनैलगंज व परसपुर की करीब एक लाख आबादी बाढ़ से प्रभावित होती है। जुलाई से लेकर अगस्त और कभी-कभी तो सितंबर माह तक स्कूल बंद रहता है। इसलिए बच्चों को नकहरा, गौरा सिंहपुर, प्रतापपुर, काशीपुर के प्राइमरी स्कूलों में बच्चों को पढ़ने के लिए भेजना पड़ता है। लेकिन बाढ़ आते ही ये सारे स्कूल बाढ़ चौकियां बन जाती हैं और पढ़ाई पूरी तरह से ठप हो जाती हैं।
दस गांवों का खत्म हो चुका है अस्तित्व
परसपुर क्षेत्र में चंदापुर किटौली गांव तो आज भी जिले के नक्शे में है। इस गांव में 14 मजरे थे। आज इसमें केवल तीन मजरे ही बचे हैं। इन दस वर्षों में दस मजरे घाघरा की धारा में समाहित हो चुके हैं। इन मजरों में रहने वाले मुख्य गांव चंदापुर में आकर बस गए हैं या फिर ऊंचे स्थानों पर स्थित उनकी जमीन या फिर बांध पर टिके हैं।
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