प्रशासन की अनदेखी परिषदीय स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों पर भारी पड़ रही है। जिले के तीन सौ स्कूलों में लगाए गए हैंडपंप दूषित पानी दे रहे हैं। अफसर इन हैंडपंपों की मरम्मत के लिए बजट का जुगाड़ नहीं कर सके हैं। दो साल से इसकी फाइल धूल फांक रही है। इस लापरवाही के कारण परिषदीय स्कूलों के 50 हजार नौनिहाल दूषित पानी पीने को विवश हैं। इसकी जांच दो साल पहले नीर निर्मल परियोजना के तहत कराई गई थी। तब से अब तक मरम्मत कार्य नहीं हो सका है।
सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले नौनिहालों को शुद्ध पेयजल मुहैया कराने के उद्देश्य से स्कूलों में इंडिया मार्का हैंडपंप लगाया जाता है। मानकों के मुताबिक इन हैंडपंपों को 120 से 150 फीट की गहराई की बोंरिग कर लगाया जाना चाहिए। लेकिन बोरिंग करने वाले ठेकेदार इसे 80 से 90 फीट की बोंरिग पर ही लगा देते हैं। परिणाम यह होता है कि यह हैंडपंप लगाए जाने के साल भर बाद ही दगा दे जाते हैं और प्रदूषित पानी उगलने लगते हैं।
ठेकेदारो की यही कारगुजारियां परिषदीय स्कूलों के नौनिहालों पर भारी पड़ रही हैं। दो साल पहले 2014 में नीर निर्मल परियोजना के तहत जिले भर के हैंडपंपों के पानी की गुणवत्ता की जांच कराई गई थी, जिसमें 1266 हैंडपंप से प्रदूषित पानी आ रहा था। इन खराब हैंडपंपों में 167 प्राथमिक स्कूलों, 117 उच्च प्राथमिक स्कूलों व 16 कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालयों में लगाए गए 300 इंडिया मार्का हैंडपंप भी शामिल थे।
इस रिपोर्ट के बाद बेसिक शिक्षा विभाग के सर्व शिक्षा अभियान कार्यालय की ओर से राज्य परियोजना कार्यालय को रिपोर्ट भेजी गई थी और इन हैंडपंपों की मरम्मत के लिए प्रति हैंडपंप 32600 रुपये के बजट के आवंटन की मांग की गई थी लेकिन स्कूलों में सुविधाओं का पिटारा खोलने का दावा करने वाले हुक्मरान इसके जिए बजट का जुगाड़ नहीं कर सके और इन हैंडपंपों की मरम्मत नहीं हो सकी।