गोंडा। जिले के सरकारी चिकित्सालयों को दवा व जांच करने वाले रसायनों से परिपूर्ण करने के लिए शासन ने भरपूर बजट दिया है। इस मद में 41 करोड़ से अधिक राशि खाते में है फिर भी तीन माह से मरीजों को जांच के लिए लौटाया जा रहा है। मरीजों को बाहर जांच कराने की सलाह देकर कमीशनखोरी को बढ़ावा दिया जा रहा है। कागज पर एक्सरे रिपोर्ट दी जा रही है। पैथालॉजी जांच के लिए कई रिजेंट नहीं हैं। जीवन रक्षक दवाओं का अकाल है। जिला अस्पताल में होने वाली जांच व दवाओं की स्थिति की पड़ताल में इसका खुलासा हुआ है।
स्वास्थ्य महकमा की स्थिति डांवाडोल हो चुकी है। मौजूदा समय जब संचारी रोग की रोकथाम के लिए अभियान चलाया जा रहा है। मस्तिष्क ज्वर, जापानी इंसेफेलाइटिस सहित बुखार के तमाम केस अस्पताल में आ रहे हैं। मंडलीय चिकित्सालय में मरीजों को न तो दवाएं मिल पा रही हैं और न ही उनकी मुक्कमल जांच हो पा रही है। रिजेंट न होने का हवाला देकर उन्हें बाहर से जांच कराने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। रामलोचन निवासी बिरतिहा ने बताया कि वह थायराइड की जांच कराने के लिए आए थे लेकिन रसायन न होने का हवाला देकर वापस कर दिया गया। बाहर से 400 रुपये देकर जांच कराई है जिसकी रिपोर्ट एक सप्ताह में देने को कहा गया है, जबकि अस्पताल में आधुनिक मशीनें लगी हैं और उसी दिन रिपोर्ट मिलने की व्यवस्था है।
प्लेट की जगह कागज पर दी जा रही एक्सरे रिपोर्ट
मंडलीय चिकित्सालय में एक्सरे प्लेट खरीदने के लिए धनराशि नहीं है। इसका उदाहरण एक्सरे कराने वालों को कागज पर दी जा रही रिपोर्ट से दिखता है। यहां प्रतिदिन दो सौ से अधिक लोगों के एक्सरे किए जाते हैं। अस्पताल प्रशासन के पास उपकरण व रसायनों की खरीदने के लिए 30 लाख रुपसे बीते जुलाई माह में शासन ने आवंटित किए हैं। यह धनराशि विभाग के खाते में है फिर भी मरीजों को बाहर जांच कराने के लिए मजबूर किया जा रहा है। यहां स्थिति यह है कि एक्सरे प्लेट खरीदने के लिए बहुत पहले की प्रशासन के पास डिमांड भेजी गई है लेकिन अस्पताल में बजट न होने का रोना रोया जा रहा है।
नहीं हैं मस्तिष्क ज्वर व अन्य बीमारी की दवाएं
मौजूदा समय मस्तिष्क ज्वर सहित बुखार व अन्य बीमारी से लोग परेशान हैं। अस्पताल में भारी भीड़ उमड़ रही है लेकिन मरीजों के इलाज के लिए दवाएं नहीं हैं। मस्तिष्क ज्वर में प्रयोग होने वाली मेनिटाल, एनएस, पैरासीटामाल का इंजेक्शन व फेनारगन जैसी दवाएं अस्पताल में नहीं हैं। इस समय संचारी रोग नियंत्रण के लिए अभियान चलाया जा रहा है और इसके लिए अलग से वार्ड बनाया गया है। इस बात की पुष्टि औषधि भंडार के फार्मेसी अधिकारी ने की है। दवाओं की आपूर्ति के लिए डिमांड भेजने की बात कही गई।
औषधि एवं रसायन मद में शासन ने दिया है 41 करोड़ का बजट
महानिदेशक स्वास्थ्य सेवाएं उत्तर प्रदेश ने बीते जुलाई माह में ही औषधि एवं रसायन की खरीद के लिए 41 करोड़ 24 लाख 75 हजार 161 रुपए आवंटित किए हैं। जिससे जरूरी दवाएं, जांच के लिए रसायन व उपकरणों की खरीद की जा सके और सभी सरकारी चिकित्सालयों को उपलब्ध करायी जा सके। इसी धनराशि में से 30 लाख रुपए का आवंटन जिला चिकित्सालय को किया गया है।
दो माह से खराब है सिटी स्कैन मशीन
मंडल चिकित्सालय में एमआरआई मशीन लगाने की तैयारी चल रही है लेकिन पहले से लगी सिटी स्कैन मशीन खराब है। सिटी स्कैन मशीन बीते दो माह से खराब है और मरीजों को यह जांच निजी क्षेत्र में 3 हजार रुपए से लेकर पांच हजार रुपये देकर करानी पड़ रही है, जबकि जिला चिकित्सालय के क्षेत्रीय निदान केंद्र में यह जांच मात्र 500 रुपये में ही होती थी, लेकिन अब कक्ष बंद है।
अल्ट्रासाउंड कराने में छूट रहे छक्के
एक मात्र चिकित्सक के होने के कारण अल्ट्रासाउंड कराना आसान नहीं है। जिला महिला अस्पताल में भी मशीन लगी है लेकिन यहां जांच न करके उन्हें भी जिला अस्पताल भेजा जा रहा है। ऐसे में इस जांच के लिए सैकड़ों की भीड़ जुटती है और धक्कामुक्की तक की नौबत आती है। जांच करने वाले डाक्टर पीके श्रीवास्तव कहते हैं कि इसी लोड के कारण एक डाक्टर की हृदयगति रुकने के कारण मौत हो चुकी है। इस कार्य में उन्हें तनाव झेलना पड़ता है।
हमारे पास नहीं है बजट, एक्सरे प्लेट मिलने हो रही दिक्कत
बजट न होने कारण थायरायड जांच नहीं हो पा रही है। प्लेट की दिक्कत के चलते एक्सरे केवल इनडोर मरीजों का कराया जा रहा है बाकी पेपर पर रिपोर्ट दी जा रही है। लोकल परचेज के लिए बजट नहीं है। दवाओं की भी कमी है। दवाओं की आपूर्ति कार्पोरेशन को करना है। सिटी स्कैन मशीन 20 साल पुरानी है। नई खरीदने के लिए डिमांड शासन को भेजी जा रही है। -डॉ अरुण लाल, प्रमुख चिकित्साधीक्षक गोंडा