टीएलएम के जरिए विकसित कर रहे विज्ञान की समझ
उच्च प्राथमिक विद्यालय जयरामजोत में नवाचार विधि की धूम
उमानाथ तिवारी
गोंडा। कहते हैं कि जहां चाह होती है वहां राह निकल ही आती है। ठीक यही बात बेसिक शिक्षा परिषदीय विद्यालयों पर भी लागू होती है। यहां निजी स्कूलों की तरह शिक्षण की मंहगी तकनीक भले ही मौजूद न हो पर मन में अगर कुछ अलग कर दिखाने का जज्बा हो तो सीमित संसाधनों में भी राह निकल ही आती है। कुछ इसी तरह का प्रयास कटरा बाजार के पूर्व माध्यमिक विद्यालय जयरामजोत के प्रधानाध्यापक कर रहे हैं। बच्चों में विज्ञान व गणित जैसे कठिन दिखने वाले विषयों के प्रति रुचि उत्पन्न करने के लिए वह विद्यालय में मौजूद सस्ते संसाधनों का सहारा ले रहे हैं। स्कूल में उनके इस टीएलएम(टीचिंग लर्निंग मटेरियल) के प्रयोग की धूम मची है। वह बच्चों को टीएलएम के जरिए विज्ञान से जुड़ी नई-नई जानकारियां देकर उन्हें विज्ञान की अवधारणाओं के बारे में बता रहे हैं। बच्चे भी पूरी तन्मयता के साथ इस नवाचार शिक्षण विधि का लुत्फ उठा रहे हैं और विज्ञान व गणित के प्रति अपनी समझ को विकसित कर रहे हैं।
कटरा बाजार शिक्षा क्षेत्र के पूर्व माध्यमिक विद्यालय जयरामजोत में प्रधानाध्यापक के पद पर शिक्षक आशुतोष तिवारी की तैनाती है। इस विद्यालय में कुल 62 छात्र छात्राओं का नामांकन है। शिक्षक आशुतोष के मुताबिक औसतन 50 बच्चे नियमित रुप से स्कूल आते हैं। वैसे तो इन बच्चों को सभी विषयों की शिक्षा दी जाती है लेकिन विज्ञान व गणित जैसे कठिन माने जाने वाले विषयों की पढ़ाई के लिए कुछ अतिरिक्त संसाधनों की आवश्यकता होती है। विभाग के सीमित संसाधनों के जरिए ही बच्चों को इन विषयों में पारंगत किया जाना है। संसाधन के अभाव में बच्चे अक्सर इन विषयों को ठीक ढंग से समझ नहीं पाते और इन्हे कठिन विषय मानकर इनसे दूरी बनाने लगते हैं। आशुतोष को जब लगा कि बच्चे इन दोनों विषयों से दूर हो रहे हैं तो उन्होंने स्कूल में ही मौजूद संसाधनों का प्रयोग शिक्षण अधिगम सामग्री के रुप में करना शुरु किया। आशुतोष ने बताया कि इसके लिए उन्होंने गुब्बारे, चाक व कागज के टुकड़ों का उपयोग टीएलएम के रुप में किया। विज्ञान में वायु स्थान घेरती है और उसमें गति व शक्ति भी होती है इस अवधारणा को बच्चों को समझाने के लिए उन्होने गुब्बारे का सहारा लिया। इसी तरह से गणित के वर्ग व वर्गमूल जैसे कठिन सवालों को आसान बनाते हुए चाक के टुकड़ों के जरिए बच्चों को इसे हल करने की विधि समझाई। भिन्न के सवालों को हल करने के लिए कागज की पट्टियों को आधार बनाया। फूल के विभिन्न भागों की जानकारी देने के लिए गतिविधि आधारित शिक्षण विधि अपनाई। शिक्षक के इस नवाचार शिक्षण पद्धति को बच्चे भी काफी रुचि से अपना रहे हैं और विज्ञान व गणित जैसे विषयों में अपनी समझ को विकसित कर रहे हैं।
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बच्चों ने बांधा तारीफों का पुलिंदा
गोंडा। किसी भी शिक्षक के लिए उनके छात्र की संतुष्टि ही सबसे बड़ी गुरुदक्षिणा होती हैं। बस यही उपलब्धि पाकर आशुतोष फूले नहीं समाते। छठवीं में पढने वाली छात्रा कामिनी, सोनी, नाजरीन, नगमा, शहरतुन, सादिया व अंकित ने बताया कि इस प्रकार के गतिविधि आधारित शिक्षण से न सिर्फ वह विषय को आसानी से समझ रहे हैं बल्कि उन्हे निजी स्कूलों के बच्चों की तरह ट्यूशन करने की भी जरुरत नही पड़ रही है। इसी तरह से सातवीं क्लास के छात्र वेद, ओम, सत्यप्रकाश, शालू, आफरीन, लक्ष्मी, मोनी, आदेश व आठवीं के लवकुश सुब्बी व नूरबानो ने भी शिक्षण की इस विधि की तारीफ की।
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पाठ्यक्रम को बच्चे आसानी से समझ सके इसके लिए परिषदीय स्कूलों में गतिविधि आधारित शिक्षण पर जोर दिया जाता है। इसके माध्यम से बच्चों में अपने विषय की प्रति रुचि भी बनी रहती है। पूर्व माध्यमिक विद्यालय जयरामजोत के शिक्षक का प्रयास सराहनीय है। अन्य शिक्षकों को भी इससे प्रेरणा लेने की आवश्यकता है।
संतोष कुमार देव पांडेय,बीएसए