जिले में खतरनाक एक्सडीआर (एक्सटेंसिवली ड्रग रेजिस्टेंट) टीबी ने दस्तक दे दी है। इससे स्वास्थ्य महकमा चिंतित है। विभाग की सबसे बड़ी चुनौती बीमारी की इस किस्म को रोकने की है। ऐसे में स्वास्थ्य महकमा क्षय रोग के
इलाज की फुलप्रूफ व्यवस्था करने में लगा हुआ है। लखनऊ की क्षय रोग नियंत्रण विभाग की 15 सदस्यीय टीम जिले के सभी डाट्स केंद्रों के कामकाज की समीक्षा कर रही है। इस क्रम में शुक्रवार को टीम ने जिला अस्पताल स्थित क्षय
रोग विभाग में सदर मुहम्मदाबाद और कासिमाबाद सामुदायिक केंद्रों पर क्षय रोगियों के इलाज की बाबत जानकारी ली। जिले में क्षय रोग के 350 मरीजों का इलाज चल रहा है। इसमें 10 फीसदी से ज्यादा रोगी मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट हो
गए हैं जबकि एक्सेंसिवली ड्रग रेजिस्टेंट टीवी का एक मामला भी सामने आया है। क्षय रोग का इलाज बीच में छोड़ने वाले रोगियों में बाद में कोई दवा काम नहीं करती है। ऐसे रोगियों का इलाज बेहद खर्चीला और मुश्किल हो जाता है।
इनसे फैलने वाली बीमारी भी विभिन्न दवाओं की प्रतिरोधी हो सकती और कुछ रोगियों पर तो कोई दवा ही काम नहीं करती है। एक्सडीआर और एमडीआर टीवी के मरीजों की बढ़ती संख्या को देखते हुए स्वास्थ्य महकमा चिंतित है। क्षय
रोग के मरीजों के बीच में दवा छोड़ने की प्रवृत्ति चिंता का विषय है। निजी चिकित्सकों को भी प्रेरित किया जा रहा है कि वे मरीजों को डाट्स से दवाएं दिलाएं ताकि दवा बीच में छोड़ने की प्रवृत्ति पर लगाम लगाई जा सके।
पुनरक्षित राष्ट्रीय क्षयरोग नियंत्रण कार्यक्रम की जमीनी हकीकत का पता लगान के लिए आई टीम ने पहले दिन सैदपुर और जखनिया सामुदायिक केंद्र का निरीक्षण किया। शुक्रवार को सदर एवं मुहम्मदाबाद और कासिमाबाद सामुदायिक
केंद्रों पर इलाज का लेखाजोखा देखा और इलाज की हकीकत का पता लगाया। जिला क्षय अधिकारी डा.कृष्ण कुमार वर्मा ने बताया कि हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती डाट्स प्रोवाइडरों की कमी है। इसके अलावा डाट्स के 10 नए केंद्र
खोले जाने है। उनको लिए भी मानव संसाधन की जरूरत है। लखनऊ से आई टीम में जेडी डॉ. सुरेंद्र पटवार, डॉ. सुशील चतुर्वेदी, एचआईवी और टीबी कोआर्डिनेटर लखनऊ डॉ. नरेंद्र सिंह, डॉ. आर्दश श्रीवास्तव, जिया फातिमा, पलक खन्ना, डॉ. भवानी लाल, संजय, धीरेंद्र आदि शामिल हैं।