पिता दशरथ के निधन और श्रीराम वन गमन की सूचना मिलने पर भरत दुखी हो गए। भरत चतुरंगिनी सेना लेकर श्री राम को वापस लेने के लिए अयोध्या से प्रस्थान करते हैं। पिता दशरथ की आत्मा की शांति के लिए चारों भाई
गंगा घाट पर तिलांजलि देते हैं। भरत ने श्रीराम से अयोध्या वापस चलने के लिए आग्रह किया। श्रीराम ने अपना खड़ाऊं देकर भरत को समझा बुझाकर अयोध्या जाने का आदेश दिया। अति प्राचीन रामलीला कमेटी की ओर से
सकलेनाबाद में मंचित इस लीला को देखकर दर्शक भावविभोर हो गए।
महाराज दशरथ के निधन और श्रीराम के वनगमन के बाद गुरु वशिष्ठ व मंत्रियों की आपात बैठक हुई। अयोध्या के
राज प्रकरण को लेकर अयोध्यावासियों में खलबली मची थी। थोड़ी देर में वशिष्ठ जी ने सुमंत को बुलवाया। भरत-शत्रुघ्न को दूत से बुलवाया गया। जब दोनों भाइयों ने अयोध्या के दूतों को देखकर सशंकित हुई। गुरु वशिष्ठ के
बुलावे का आदेश होने पर भरत, शत्रुघ्न ने तत्काल अयोध्या के लिए कूच किया। भरत का रथ जैसे ही अयोध्या में प्रवेश किया अयोध्यावासी मुंह फेरने लगे। यह देख भरत दुखी होते हैं। दासी भरत को अंदर ले जाती है। भरत ने
कैकेयी से पूछा तो उन्होंने दशरथ के निधन और राम वन गमन की बात बताई।
भरत चिंतित हो उठते हैं। भरत श्री राम को बुलाने के लिए चतुरंगिनी सेना को लेकर रवाना होते हैं। इसकी सूचना पर
लक्ष्मण तरकश लिए युद्ध के लिए तैयार हो जाते हैं। इस पर श्रीराम लक्ष्मण को समझाकर शांत कराते हैं। इसके बाद भरत, गुरु वशिष्ठ और शत्रुघ्न भारद्वाज मुनि के आश्रम पर पहुंचे। चारों भाई पिता की आत्मा की शांति के लिए गंगा घाट पर तिलांजलि देते हैं। मौके पर अध्यक्ष दीनानाथ गुप्ता, कोषाध्यक्ष अभय कुमार अग्रवाल, मंत्री ओमप्रकाश तिवारी बच्चा, उप मंत्री लव कुमार त्रिवेदी, प्रबंध जैमिनी दत्त त्रिवेदी, शिवपूजन तिवारी उपस्थित रहे।
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