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Ghazipur News: 206 साल पुरानी अफीम फैक्ट्री का क्या फायदा... चार दशक से लाइसेंस न मिलने से किसानों ने बंद की खेती

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गाजीपुर। 206 साल पुरानी और एशिया की सबसे बड़ी फैक्ट्री में शुमार जिले की अफीम फैक्ट्री का लाभ यहां के किसानों को नहीं मिल पा रहा है। करीब 1980 से लाइसेंस का नवीनीकरण न होने और नहीं बनने से यहां के किसान अन्य फसलों की बोआई करने लगे। कभी इसकी खेती से अच्छा मुनाफा कमाने वाले किसानों में इसकी कसक आज भी है कि आखिर किन कारण से यहां खेती बंद कर दी गई। जबकि दूसरे प्रांतों से कनटेनर में अफीम लाया जाता है। ऐसे में स्थापित फैक्ट्री बेमतलब साबित हो रही है।
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करीेब 206 साल पुरानी और लगभग 45 एकड़ में फैली यह अफीम फैक्ट्री अब सिर्फ शोभा बढ़ा रही है। गंगा किनारे इस फैक्ट्री को 1820 में स्थापित कराया गया था। उस दौरान यहां के किसान पोस्ते की खेती करते थे और उनकी मेहनत से तैयार कच्ची अफीम से दवाइयां तैयार होती थीं। काफी वर्षों बाद एक फैक्ट्री मध्य प्रदेश के नीमच में भी स्थापित की गई। पूर्व में किसानों को अफीम की खेती का लाइसेंस दिया जाता था, जिससे उन्हें अच्छा मुनाफा होता था, लेकिन सरकार ने दशकों पूर्व लाइसेंस देना बंद कर दिया। अब यहां राजस्थान और मध्य प्रदेश से कनटेनर में अफीम आती है। कच्ची अफीम की पहले जांच होती है, उसके बाद अन्य प्रोसेस किए जाते हैं।
नवीनीकरण के लिए जाना पड़ता है बाराबंकी
जिले में वर्तमान में 12 लोग आठ-आठ बिस्वा में पोस्ते की खेती करते हैं। इनके पास पूर्व से लाइसेंस था, उसका ही बार- बार नवीनीकरण कराते हैं। इसके लिए उन्हें बाराबंकी जाना पड़ता है। जब पोस्ता तैयार होता है तो निजी वाहनों से बाराबंकी लेकर जाते हैं, जिससे समय के साथ- साथ आर्थिक दंश भी झेलना पड़ता है। जबकि पूर्व में जिले में खरीदने और नवीनीकरण का ब्रांच था तो किसानों को काफी सहूलियत होती थी।
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जमानिया तहसील के 250 बीघे में होती थी खेती
दोमट मिट्टी से भरपूर क्षेत्रों में पोस्ते की खेती होती थी। सबसे अधिक जमानिया तहसील के 250 बीघे में किसान खेती की जाती थी। किसान हृदयनारायण ने बताया कि पहले ढढनी, मिर्चा, सेवराई, भदौरा, देवल सहित अन्य गांव के किसान खेती करते थे। जब फल तैयार होता तो उसमें चीरा लगाकर छोड़ दिया जाता था। 24 घंटे बाद दूध निकलता, जिसे एकत्र किया जाता था, उस समय उसका रंग गुलाबी होता था, पुराना होने पर भूरा हो जाता था। प्रशासन द्वारा उसे तौल कराकर खरीद लिया जाता था। उस दौरान काफी निगरानी की जाती थी। करीब 1980 के आसपास लाइसेंस नवीनीकरण बंद हो गया है। उसके बाद किसान दूसरे फसलों की खेती करने लगे।


अफीम फैक्ट्री का कोई फायदा नहीं मिल पा रहा है। वजह दशकों पूर्व लाइसेंस मिलना बंद कर दिया गया। अगर किसानों को पोस्ते की खेती का लाइसेंस मिलता तो वह आर्थिक रूप से सुदृढ़ होते, लेकिन अब ऐसा नहीं है। - झिल्लू यादव, किसान नेता, किसान सभा प्रभारी जमानिया

राजस्थान और मध्य प्रदेश के किसान खेती कर रहे हैं और वहां से अफीम यहां कनटेनर में आता है। अगर यहां के किसानाें को भी लाइसेंस मिलता तो वह भी पोस्ता की खेती करते और वे लाभांवित होते हैं। दुर्भाग्य है कि यहां के किसानों को लाइसेंस नहीं दिया जा रहा है। - मोती लाल यादव
अफीम की खेती का लाइसेंस नहीं मिलने से क्षेत्र के किसान अब दूसरी खेतों के तरफ रुख कर चुके हैं। शासन को इस पर ध्यान देना चाहिए और लाइसेंस देना चाहिए, जिससे किसान पोस्ते की खेती कर सके। - रामभवन

दशकों पूर्व जब खेती होती थी तो बड़ी निगरानी की जाती थी। वहीं पोस्ता का दाना काफी सस्ता होता था, लेकिन खेती बंद हो जाने के बाद आज पोस्ता का दाना बाजार में 1000 रुपये से ऊपर मिल रहा है। यहां के किसानों को खेती का लाइसेंस देने के लिए सरकार को विचार किया जाना चाहिए। - अवधेश यादव
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